raigarh express

Raigarh Express, news of raigarh chhattisgarh

Friday, September 20, 2019
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केआईटी की स्थिति गंभीर, अगले सप्ताह बीओजी की बैठक
तकनीकी शिक्षा संचालनालय की टीम पहली बार पहुंची केआईटी
हमारे बच्चे
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नेताजी...!! ड्यूस !! फ़्यूहरर !!
ओपिनियन
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केआईटी को अंधेरे में डुबोने वाला वहां का पूर्व प्राचार्य तोमर
हमारे बच्चे
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भाषा जो हमें साथ रहना सिखाती है
ओपिनियन
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जहरीली हो रही रायगढ़ की फिजा
आसपास
जहरीली हो रही रायगढ़ की फिजा
ग्रीनपीस की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में कोरबा 17वें और रायगढ़ 48वें स्थान पर
चक्रधरनगर फाटक के पास एक्सप्रेस ट्रेन की इंजन में शार्ट सर्किट, डेढ़ घंटे तक खड़ी रही ट्रेन
सिकंदराबाद-बरौनी एक्सप्रेस (01314) की इंजन में शार्ट सर्किट होने से ट्रेन चक्रधरनगर फाटक के पास शाम साढ़े 5 बजे से 7 बजे तक खड़ी रही। जिससे फाटक के दोनों ओर जाम लग गया। ट्रेन में सवार यात्री आग लगने की अफवाह से ट्रेन छोड़कर नीच उतर गए हैं। मौके पर आरपीएफ की टीम पहुंचकर लोगों को समझाया कि आग नहीं एक सामान्य शार्ट सर्किट था। जिससे लोग वापस ट्रेन में चढ़ने लगे। qqq विदित हो कि सोमवार शाम चक्रधर नगर फाटक के पास उस समय अफरा तफरी मच गई जब फाटक 10 मिनट से ज्यादा बंद रहा और किसी ने शोर मचाया कि ट्रेन की इंजन में आग लग गई है। दखेते ही देखते पटरी पर लोगों का हूजूम उमड़ पड़ा और स्थानीय लोग भी अपने वाहन छोड़ ट्रेन की इंजन की तरफ दौड़ पड़े। इसी बीच फाटक को बंद हुए डेढ़ घंटे से अधिक समय बीत गया और दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लग गई। आरपीएफ रायगढ़ प्रभारी देवेंद्र शास्त्री ने बताया कि ट्रेन की इंजन में शार्ट सर्किट की वजह से इंजन से धुंआ निकला और एहतियातन ट्रेन को रोकना पड़ा। उनका पूरा अमला मौके पर मौजूद था। शाम 6.30 बजे कोतरलिया से दूसरा इंजन मंगाकर ट्रेन को रवाना किया गया।
2 अधिकारियों की लड़ाई में 25 परिवार सड़क पर आए
-बस अब बहुत हो चुका। जीवन से निराश हो चुका मैं। अब लड़ने की हिम्मत और औकात भी नहीं। नहीं पता परिवार के साथ क्या होगा? हताश और हैरान हूं कि मैंने निगम में नौकरी की। बीते एक सप्ताह से सोशल मीडिया में निगमकर्मियों के ऐसे भावनात्मक संदेश वायरल हो रहे हैं। कारण निगमायुक्त द्वारा एकपक्षीय कार्रवाई करते हुए 13 कर्मियों को नौकरी से बर्खास्त कर देना। 12 पर बर्खास्तगी की तलवार लटक रही है। निगमायुक्त ने जो कारण बताए हैं उस पर सारे बर्खास्त कर्मी हंस रहे हैं और इसे बदले की कार्रवाई बता रहे हैं। 54 साल के आनंद तिवारी 22 जून 1992 से परिषद में काम कर रहे हैं। वो कहते हैं कि दो अधिकारियों की लड़ाई में हम 13 परिवार सड़क पर आ गए हैं। इसमें हमारी क्या गलती। हमनें तो बस काम किया है। हमारी क्या गलती है जो उम्र के इस पड़ाव पर हमारे साथ ऐसा हो रहा है। 50 साल के शेखर मोड़क कहते हैं कि 1991 से निगम में हूँ। रायगढ़ जब पालिका से निगम हुआ हर बार खुद के लिए संघर्ष किया। अब और संघर्ष की हिम्मत नहीं बची है। बच्चे स्कूल में है और घर का एकमात्र काम करने वाला मैं हूँ। कुछ इसी तरह अरविंद द्विवेदी भी अपनी व्यथा सुनाते हुए कहते हैं कि कहने को मैं सफाई दारोगा हूं दो दर्जन वार्ड में सफाई करावने का जिम्मा मेरे कंधों पर है। पैसा प्रेष्य का मिलता है, 5 लोगों का परिवार चलाना मुश्किल है। करीब 23 साल से बेदाग नौकरी की है, इन 23 सालों में मैंने बहुत कुछ सहा है। अब जीवन के इस मोड़ पर हमें बर्खास्त किया जा रहा है जो कि गलत है। अब हम निगम से नहीं लड़ सकते। हिम्मत ही नहीं बची। हम इंसान है, कर्मचारी है कोई एक्सपेरीमेंट की चीज नहीं। कुछ इसी तरह मनोज यादव कहते हैं कि निगम ने हमें सड़क पर ला दिया। इतने सालों की मेहनत जाया हो गई। सभी बर्खास्त कर्मी एक सुर में बताते हैं कि उन्हें 2015 में नियमित करने के बाद 2 साल की परिविक्षा अवधि पूर्ण करने पर भी स्थाई नहीं किया गया। निगम आयुक्त ने बात नहीं सुनी तो वो हाई कोर्ट गए। हाई कोर्ट का भी निगम ने जवाब नहीं दिया। जनवरी 2019 में नगरी प्रशासन के सचिव निरंजन दास ने हमसे अवमानना का मामला डालने से मना कर शीघ्र स्थाई करने का वादा किया। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उनका तबादला हुआ और रायगढ़ निगम आयुक्त का भी। अवमानना का नोटिस मिला तो उसे छुपाने के लिए निगम आयुक्त ने सोची समझी रणनीति के तहत बर्खास्त कर दिया। पूर्वाग्रह से ग्रसित है अधिकारी 13 बर्खास्त कर्मियों को नियमित करने वाले तत्कालीन आयुक्त आयुक्त प्रमोद शुक्ला कहते हैं कि उन्होंने शासन के आदेशानुसार रिक्त पदों पर भर्तियां की थी। बतौर शुक्ला मैंने छानबीन समिति की रिपोर्ट और अपने 1997-1999 के कार्यकाल के आधार पर नियमानुसार भर्तियां की। तत्कालीन कलेक्टर अलरमेल मंगई डी को पता नहीं किस बात का मेरे से खुन्नस है। अब जब वो नगरीय निकाय मंत्रालय में विशेष सचिव है तो मेरे द्वारा की गई नियुक्तियों को टारगेट कर रहीं है। मैं सही हूँ और मुझे विश्वास है कि हाई कोर्ट से कर्मियों इंसाफ मिलेगा। निगम सभापति सलीम नियारिया बताते हैं कि जिन 13 लोगों को बर्खास्त किया गया है उन्हें 1994 से देख रहा हूं। तब से मैं पार्षद बनकर आ रहा हूं। जिन्होंने अपना पूरा जीवन निगम को दे दिया और अब आकर उन्हें बर्खास्त करना सरासर गलत है। इस उम्र में उनके पास जीवन यापन का सबसे बड़ा संकट है। नियमित होने के बाद सभी कर्मियों ने अपनी परिविक्षा अवधि पूरी की तब कोई एक्शन नहीं लिया गया। नगरीय प्रशासन की विशेष सचिव अलरमेल मंगई डी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं जिसके कारण उन्होंने ऐसा किया। दो अधिकारियों की लड़ाई का खामियाजा निगमकर्मियों को भुगतना पड़ रहा है। अगर सही तरीके से ये अपनी बात हाईकोर्ट में रखें तो इन्हें नहीं हटाया जा सकता। किसके इशारे पर काम कर रहे हैं आयुक्त निगम के विधि विभाग से सूत्र बताते हैं कि आयुक्त ने नोटिस देने के लिए जानकर शुक्रवार की देर शाम का समय चुना। नोटिस सभी को जानकर उसी दिन तामील होने नहीं दिया। बड़े अखबारों में सुर्खियां बनवाई। बर्खास्त कर्मी बताते हैं कि हमें ऐसा महसूस करवाया गया जैसे हमने कोई गलती की हो। निगम के सूत्र बताते हैं कि वर्तमान निगम आयुक्त, विशेष सचिव नगरीय प्रशासन अलरमेल मंगई डी के इशारे पर काम कर रहे हैं। वो स्वयं कर्मियों को बर्खास्त करने के बाद कह चुके हैं कि उन्हें यहां इसी काम के लिए भेजा गया है। विदित हो कि अलरमेल मंगई डी जब रायगढ़ कलेक्टर थी, उनका तत्कालीन निगम आयुक्त प्रमोद शुक्ला से कई मामलों पर तीखी बहस हुई थी। अब वो प्रमोद शुक्ला द्वारा किये सारे कामों में सवाल खड़े कर रहीं हैं। वहीं इस मामले में निगम आयुक्त राजेंद्र प्रसाद गुप्ता ने साफ मना कर दिया कि कोई बात नहीं कर सकते। आप पीआरओ से बात करिए। फिर जब हमने पूछा कि आरोप आप पर लग रहे हैं तो फिर उन्होंने कहा कि इस बारे में मैं बात नहीं कर सकता। निगम के नेता प्रतिपक्ष पंकज कंकरवाल कहते हैं कि जिन 13 कर्मियों को बर्खास्त किया गया है उनसे हमें सहानूभूति है। सभी कर्मियों को अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त मौके दिए जाने चाहिए। लगातार दो दिन नगरीय प्रशासन की विशेष सचिव अलरमेल मंगई डी बात करने की कोशिश की पर उनसे बात नहीं हो पाई। qqq इस विवादित अधिकारी को किसकी शह राजेंद्र गुप्ता छत्तीसगढ़ के सबसे विवादित अधिकारियों में से एक रहे हैं। अविभाजित छत्तीसगढ़ के बिल्हा में चक्काजाम कर रहे सतनामी समाज के लोगों पर लाठी भांजने की उनकी तस्वीरें खूब छपीं थी। ऐसे छोटे-मोटे किस्सों से राजेंद्र गुप्ता का कार्यकाल भरा हुआ है। जब वो रायगढ़ में ज्वाइंट कलेक्टर थे तब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दयाराम ठेठवार के साथ हुज्जतबाजी की थी उनके साथ आए कांग्रेसियों के साथ भी बदतमीजी की थी। दरअसल दयाराम ठेठवार अपनी नातिन का सर्टिफिकेट बनवाने के सिलसिले में राजेंद्र गुप्ता के पास गए थे। इसके बाद जब सारंगढ़ एसडीएम बने तो क्रशर वालों पर मीडिया के मार्फत खबरों से दबाव बनाते हुए जमकर पैसा वसूला। उनके ट्रांसफर पर जिलेवासियों ने राहत की सांस ली थी लेकिन जैसे ही सरकार बदली वो एक बार फिर रायगढ़ आ गए वो भी निगम आयुक्त बनकर। चार्ज लेने के साथ ही अपने आने की धमक उन्होंने बिग बाजार में छापा मारकर किया। मीडिया लीक्स करना और सुर्खियों में बने रहना उनकी आदत है। उनके कार्यकाल में छापा-सस्पेंड-ज्वाइन-अटैच का खेल खूब चलेगा। अब सवाल यह है कि इतने विवादित अधिकारी को भाजपा की सरकार ने 15 साल तक शह दी और अब जब कांग्रेस की सरकार आई है तो भी ये वैसे ही हैं। सवाल यह है कि इन पर आखिर किसका वरदहस्त है। qqq रिकार्ड को दीमक ने खाया नगर पालिका और निगम में चतुर्थ वर्ग प्रेष्य (भृत्य) की भर्ती के लिए कोई परीक्षा या साक्षात्कार नहीं होती। निगम में सालों से दैनिक वेतन भोगी कर्मियों में से ही कुछ लोगों का नियमितीकरण होता है। इन दैनिक वेतन भोगियों को भले ही रोजी के हिसाब से पैसा मिलता है लेकिन पूरा निगम यही चलाते हैं। रायगढ़ नगर निगम में वर्तमान में पदस्थ कई अधिकारी-कर्मचारी इसी प्रोसेस से आए हैं। 1989 के बाद से प्रेष्य पर भर्ती नहीं हुई थी। दैनिक वेतन भोगी लगातार इसके लिए संघर्ष किए हुए थे। शासन स्तर से निगम को आदेश हुआ कि भर्ती की जाए। साल 2011-12 में निगम आयुक्त राकेश जायसवाल ने भर्ती के लिए छानबीन समिति बनाई। जिसका काम था कि जिन्होंने आवेदन दिया था उनका मस्टर रोल चेक करना और कब से काम कर रहे हैं जांच करना। छानबीन समिति ने रिपोर्ट दी कि पुराने सारे मस्टर रोल दीमक खा गए हैं जिससे पता लगाना मुश्किल है कि कौन कितने दिन से काम कर रहा है। 2014 में निगम आयुक्त बने प्रमोद शुक्ला, जिन्होंने प्रदेश सरकार से बाकायदा परमिशन लेकर प्रेष्य पद पर भर्ती किया। प्रमोद शुक्ला ने इन कर्मियों को वेरिफाई किया कि वो इन्हें 1997 से जानते हैं क्योंकि 1997-99 तक वे मुख्य नगर पालिका अधिकारी रहे थे। इस आधार पर उन्होंने 15 जनवरी 2015 को 25 प्रेष्यों की पहली लिस्ट जारी की। इस लिस्ट पर कई लोगों ने सवाल उठाए और कहा कि कई पुराने लोगों का नाम नहीं है। कलेक्टर मुकेश बंसल से शिकायत हुई तो उन्होंने 1 सप्ताह में इस लिस्ट को रद कर दिया। 25 कर्मी हाई कोर्ट की शरण में गए जहां से उन्हें स्टे मिल गया और अभी तक उन पर कोई आंच नहीं आई है। लेकिन वर्तमान आयुक्त राजेंद्र गुप्ता ने उन्हें राडार में लेने की बात कह दी है। qqq स्थाई होने की मांग की तो बर्खास्त कर दिया 15 अक्टूबर 2015 को दूसरी लिस्ट जारी हुई। इस लिस्ट को लेकर कोई हो-हल्ला नहीं मचा। 2 साल की परीविक्षा अवधि इन कर्मियों ने काटा। स्थाई करने के नाम पर निगम फिर से आनाकानी करने लगा। कर्मी हाई कोर्ट की शरण में गए। कोर्ट ने नगरी प्रशासन मंत्रालय को 5 महीने और रायगढ़ निगम आयुक्त तो 1 महीने का समय दिया लेकिन दोनों ने कोई जवाब कोर्ट में नहीं दिया। कोर्ट के आदेश की अवमानना होने की स्थिति में जनवरी 2019 में विशेष सचिव नगरीय प्रशासन निरंजन दास ने कर्मियों के एक प्रतिनिध मंडल को रायपुर बुलाया और आश्वस्त किया वो कोर्ट ना जाएं और उन्हें तत्काल स्थाई कर दिया जाएगा। कर्मियों का काम बन रहा था वो भी आगे की कार्यवाही नहीं करने का मन बना लिए। इसी बीच सचिव का तबादला हो गया। नई विशेष सचिव रायगढ़ की पूर्व कलेक्टर अलरमेल मंगई डी बनी। इधर निगम में भी नए आयुक्त राजेंद्र गुप्ता आ गए। लेकिन कर्मी स्थाई नहीं हुए। जिसके लिए वे कोर्ट की शरण में गए। कर्मियों का आरोप है कि हाई कोर्ट से अवमानना को नोटिस मिलने के डर पर राजेंद्र गुप्ता ने आनन-फानन में खुद को बचाने के लिए हमें सस्पेंड किया और जानकर शुक्रवार की रात का समय रखा ताकि 7 में से 2 दिन खराब हो जाएं। चूंकि उनकी तरफ से मामला हाई कोर्ट में चल रहा है तो निगम ने केविएट ( कोर्ट में अपील के समय एकपक्षीय कार्यवाही और सुनवाई न हो और दूसरे पक्ष को भी इस बारे में सूचित करने के बाद आगे कार्रवाही हो। यह सिर्फ 90 दिनों के लिए वैध रहता है) भी दायर कर दिया। आधिकारिक रूप से नोटिस देने की बजाए नगर निगम आयुक्त राजेंद्र गुप्ता ने मीडिया के माध्यम से अपने मातहतों को सूचित किया। कर्मियों ने अपना जवाब दिया साथ ही इसी बीच कोर्ट से अवमानना का नोटिस भी आयुक्त को मिला तो एक पक्षीय कार्रवाई करते हुए आयुक्त ने 13 कर्मियों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया। 12 कर्मियों पर कभी भी कार्रवाई हो सकती है।
बाघ तालाब पर पड़ी गिद्धों की नजर, कभी फर्जी वसीयत तो कभी जानकर कब्जा
-पूर्णत: या भागत: राज्य निधि से पोषित या साधारण जनता के प्रयोग कि लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नान घाटों, सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग के संबंध में किसी भी निर्योषयता, दायित्व, निर्बन्धन या शर्त के अधीन नहीं होगा। - आर्टिकल 15 का अंश, भारत का संविधान 130 साल पुराने बाघ तालाब को बाघ तालाब इसलिए कहते हैं कि यहां पिंजरे में बाघ रहते थे। आम जनता के बाघ तालाब पीने-नहाने और निस्तारी की सबसे बड़ी जगह थी। 50 साल तक तालाब में लोग बेफ्रिक होकर आते-जाते किसी पर कोई पाबंदी नहीं थी। लेकिन 1947 में जैसे ही रियासतों का मर्जर हुआ बाघ तालाब के अच्छे दिन पर बादल मंडराने लगे। बाघ तालाब राजा ललित सिंह की निजी संपत्ति थी लेकिन मर्जर के नियमानुसार वो इसके स्वरुप और उपयोग नहीं बदल सकते थे। कुछ साल बाद 1959-60 में राजा ने तालाब को हरि भैना नाम के शख्स को बेच दिया। जबकि 14 मार्च 1948 को संपन्न स्टेट मर्जर एग्रीमेंट में रायगढ़ राजा की व्यक्तिगत संपत्ति इस शर्त के साथ मान्य की गई कि बाघ तालाब पर आम जनता का निस्तारी हक पूर्वतर बदस्तूर जारी रहेगा। पुराने नजूल अभिलेखों के मेंटेनेंस खसरा में यह शर्त विशेष रूप से दर्ज होती रही है। इसके साथ ही नवंबर 1954 को गर्वमेंट ऑफ एमपी पॉलिटिकल एंड मिलिट्री डिपार्टमेंट द्वारा राजा साहेब रायगढ़ को लिखा था कि उन्हें अपने स्वामित्व की व्यक्तिगत एवं किसी भी प्रापर्टी को बेचने की अधिकार नहीं है। इसके बाद भी राजा ने संतोष भैना को बाघ तालाब बेचा। फिर हरि भैना ने मात्र 9 हजार रुपये में करीब 24 एकड़ रकबे वाले तालाब को नारायण सिंह को बेच दिया। नारायण सिंह ने इस तालाब में मछलीपालन किया और सब कुछ सही चल रहा था। 1993 आते-आते तत्कालीन नगर पालिका के प्रशासक केडीपी राव ने बाघ तालाब में बोट क्लब बनाने का आदेश दिया। बोट क्लब में लोग आने भी लगे। लेकिन बोट क्लब में रेस्टोरेंट और पार्किंग की जगह को लेकर मालिक नारायण सिंह और नगर पालिका के बीच बात नहीं बनी और 5 फरवरी 1994 को मामला कोर्ट में गया। बोट क्लब बंद हो गया। फैसला नारायण सिंह के पक्ष में आया। तालाब वैसा ही बना रहा लेकिन एक बार फिर 2006 में निर्माण को लेकर नगर निगम और नारायण सिंह के वारिसों के बीच मामला हाईकोर्ट चला गया। जिसका केस नंबर 521/2004 है। केस अभी तक चल रहा है। qqq फर्जी वसीयत से तालाब पर कब्जा करने की कोशिश बाघ तालाब पर गिद्धों की नजर ऐसी पड़ी है कि वो किसी भी हद तक जाने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। ऐसा ही मामला 7 साल पहले आया था जब अमित रतेरिया नाम के एक शख्स ने बाघ तालाब को लेकर फर्जी वसीयत पेश किया था। अमित ने नजूल कार्यालय में दावा पेश किया कि तालाब पर उसका मालिकाना हक है। तिथि से 20 साल पहले तालाब के मालिक नारायण सिंह ने अपने मरने से एक साल पहले जब अमित की उम्र महज 10 साल थी तब नारायण सिंह ने तालाब की पूरी जमीन अमित को इसलिए दान कर दी थी कि अमित के दादाजी ने अंत समय में नारायण सिंह की खूब सेवा की थी। वसीयत में यह तक लिखा है कि नायायण सिंह के पास अकूत संपत्ति है जिससे उनके वारिसान का गुजारा आसानी हो जाएगा। इसलिए वो अमित रतेरिया के दादाजी की सेवा से खुश होकर सारी जमीन अमित के नाम कर रहे हैं। अमित द्वारा पेश फर्जी वसीयत के साथ बयान में यह भी कहा था कि उन्हें बीस साल पहले की सारी घटना याद है, सभी गवाहों को वो बखूबी पहचानते हैं साथ ही दिवंगत नारायण सिंह के हस्ताक्षर को पहचानते हैं। 10 साल के बच्चे को 20 साल के बाद सारी घटना याद है हर कोई आश्चर्यचकित था। नजूल विभाग ने दो कदम आगे की चाल चली। तालाब के 23 एकड़ रकबे को अमित रतेरिया के नाम चढ़ाने का काम भी शुरू हो गया। लेकिन भला हो तालाब के लिए काम करने वाले शिवशरण पाण्डेय. डॉ. राजू अग्रवाल, गणेश कछवाहा, फिरोज अख्तर का जिन्होंने तालाब बचाने के लिए लगातार काम किया। इसी दौरान कलेक्टर भी बदल गए और कलेक्टर मुकेश बंसल ने तालाब के गिद्धों की जमकर खबर ली। किसी भी प्रकार के नामांतरण को तुरंत निरस्त किया और घोटाले में शामिल अधिकारियों-कर्मचारियों पर कार्रवाई करते हुए अमित, नजूल अधिकारी एवं सरदार नारायण सिंह के उत्तराधिकारियों के रूप मामला दर्ज किया जो आज भी जारी है। कार्रवाई के बाद सारे दावों की पोल खुली कलेक्टर के रौद्र रूप को देखते हुए अमित रतेरिया को 20 साल बाद सफाई में मिले फर्जी वसीयत को देने के दावे से दिवंगत नारायण सिंह की पत्नी भी मुकर गईं और अमित एंड मित्रों का सपना कलेक्टर मुकेश बंसल ने रोक दिया। बाघ तालाब को लेकर उपजे विवाद पर नारायण सिंह के पुत्र हरमिदंर सिंह कहते हैं कि बाघ तालाब हमारी निजी संपत्ति है और तालाब के परिसर में निर्माण को लेकर मामला कोर्ट में है तो ज्यादा नहीं कहूंगा। कोई वसीयत हमारे घर में नहीं मिली थी। कॉम्पलेक्स बनाना और बिल्डर्स को बेचना जैसी सारी बातें अफवाह हैं। qqq तालाब एक कहानी अनेक बाघ तालाब की ऐसी हालत क्यों है यह ऐसा सवाल है जिस पर प्रशासनिक हलके में सबके हलक सूख जाते हैं। लोगों में तरह-तरह की कहानियां प्रचलित है। कोई कहता है बहुत पेचीदा है मामला है तो कोई कहता है कि इसका कुछ नहीं हो सकता। रायगढ़ के अन्य पट चुके तालाबों के जैसा इसकी भी हाल होगा। क्या यह सही है कि रायगढ़ शहर का सबसे बड़ा तालाब प्रशासन की अनदेखी की भेट चढ़ जाएगा। सभी अपनी मौन सहमति दे देते हैं। तालाब बचाने के लिए युवाओं में कोई जिज्ञासा नहीं है। ना तो वार्ड पार्षद को ना ही विधायक को। स्थानीय निवासी दिनेश कुमार कहते हैं कि 5 साल विधायक रहने के दौरान पूर्व विधायक रोशन लाल अग्रवाल को कभी बाघ तालाब की याद नहीं आई अब जब विधायकी छूट गई तो तालाब बचाने को प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हैं जबकि पूरा शहर जानता है कि उनका नया बीजेपी कार्यालय नकटी तालाब को पाटकर बना है। ऐेसे में पूर्व विधायक की तालाब की चिंता करना महज घड़ियाली आंसू है। दिनेश यह भी कहते हैं कि वर्तमान विधायक अभी तक यह विश्वास ही नहीं हो रहा है कि वो विधायक हैं। पहले तो उन्हें विधायकी का एहसास होने दो फिर वो कुछ दूसरा सोच पाएंगे। क्रमश: (अगले भाग में पढ़ें ज़िला प्रशासन की संदिग्ध भूमिका, पूर्व विधायक की साजिश और बाघ तालाब को बचाने किसने और क्या किया)
धनकुबेरों का लोकतंत्र
संदर्भ : भारतीय लोकतंत्र की नई परिभाषा धनकुबेरों की, धनकुबेरों द्वारा, धनकुबेरों के लिये
सुरुज ले आंखी मिला के मनिस लोकतंत्र के जब्बर तिहार
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सरकार चुनने के लिए लोगों ने दिखाया उत्साह। बैसाख की भरी दोपहरी में भी लंबी कतारों में खड़े रहे मतदाता। लोकसभा क्षेत्र में 74.76 फीसदी वोटिंग हुई।
दिलचस्प आंकड़ों के आईने में रायगढ़ लोकसभा सीट
लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण के मतदान के एक दिन पहले जिले में सन्नाटा फैला हुआ था। चुनाव काम में लगी गाड़ियां ही सड़कों पर आती-जाती दिखीं। इसके पहले प्रचार के अंतिम दिन दोनों दलों ने शहर मे रैली कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। कांग्रेस के तरफ से एनएसयूआई के अगुवाई में जहां रैली निकाली गई वहीं भाजपा ने अलग अलग क्षेत्रों में स्थानीय चेहरों के साथ रैली निकाली। हालांकि आम लोगों पर किसी भी रैली का असर नहीं दिखा। मतदाता अभी ख़ामोश है और 23 अप्रैल के इंताजर कर रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो भाजपा प्रत्याशी विष्णुदेव साय को 6,62,478 वोट मिले थे वहीं कांग्रेस प्रत्याशी आरती सिंह को 4,45,728 वोट मिले थे और भाजपा ने 216450 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी लेकिन इस वर्ष चुनावी समीकरण बदल गए और रायगढ़ लोकसभा के सभी आठों विधानसभा में कांग्रेस के विधायक जीत कर आए हैं और इन सभी विधायकों के जीत का अंतर 1,97,527 है। वहीं भाजपा ने वर्तमान सांसद विष्णु देव साय की टिकट काटकर नए प्रत्याशी गोमती साय को मैदान में उतारा है ऐसे में देखना होगा कि क्या भाजपा नए और महिला प्रत्याशी के बल पर इस आंकड़े को पाटने में सक्षम हो पाती है? रायगढ़ लोकसभा क्षेत्र में करीब 17 लाख मतदाता 14 प्रत्याशियों के भविष्य तय करेंगे। जिसमें 10 लाख 99 हजार मतदाता रायगढ़ जिले के हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में 8 विधानसभा क्षेत्र हैं रायगढ़, सारंगढ़, धरमजयगढ़, खरसिया, लैलूंगा, पत्थलगांव, कुनकुरी, जशपुर। इन सभी सीटों पर फिलहाल कांग्रेस काबिज है। पिछले चार बार से लगातार भाजपा ने यहां जीत दर्ज की है। पिछले विधानसभा चुनाव में जशपुर जिले की तीनों सीट भाजपा से कांग्रेस ने छीन ली। जशपुर और कुनकुरी लगातार 35 वर्षों से भाजपा के कब्जे में थी। यहां सांसद ने एक बार भाजपा की टिकट से विधानसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस ने दो बार अपने विधायकों को लोकसभा का टिकट दिया लेकिन न तो सांसद विधायक बन पाए और न ही विधायक कभी सांसद। इस बार फिर कांग्रेस ने धरमजयगढ़ विधायक को टिकट दी है। लालजीत राठिया के नाना उमेद सिंह राठिया यहां से सांसद रह चुके है और पिता संयुक्त मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सरकारों में मंत्री लेकिन गोमती साय की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। वे वर्तमान में जशपुर जिले पंचायत अध्यक्ष हैं। रायगढ़ सीट से कांग्रेस ने वर्ष 1967, 1980, 1985, 1989, 1991, 1996, 1999 एवं 2014 में महिला प्रत्याशियों को मौका दिया था। इसमें चार बार महिलाएं सफल हुई है जबकि भाजपा ने इस सीट से पहली बार किसी महिला प्रत्याशी को मौका दिया है। qqq उम्मीदवार घर-घर जाकर कर रहे संपर्क लोकसभा निर्वाचन के तीसरे और प्रदेश में अंतिम चरण में सात लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के लिए प्रचार का काम रविवार शाम पाँच बजे समाप्त हो गया था। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सुब्रत साहू ने रायगढ़ एक्सप्रेस से हुई खास बातचीत में बताया कि तीसरे चरण में रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, जांजगीर, कोरबा, रायगढ़ तथा सरगुजा लोकसभा क्षेत्रों के लिए 23 अप्रैल को मतदान होगा। लोकसभा क्षेत्रों के लिए कुल 123 अभ्यर्थी निर्वाचन में हिस्सा ले रहें हैं। प्रचार का शोर थमने के बाद अभ्यर्थी घर-घर जाकर और व्यक्तिगत संपर्क कर अपना प्रचार कर सकेंगे। सुब्रत साहू ने बताया कि लोकसभा निर्वाचन के तीसरे चरण में 123 अभ्यर्थियों (रायपुर और बिलासपुर में 25, दुर्ग में 21, कोरबा में 13, रायगढ़ में 14, जांजगीर में 15 तथा सरगुजा में 10 अभ्यर्थी के निर्वाचन के लिए एक करोड़ 27 लाख 13 हजार 816 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। शत प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के लिए 15 हजार 408 मतदान केन्द्र बनाए गए हैं। छत्तीसगढ़ में लोकसभा निर्वाचन के दो चरणों में 4 लोकसभा क्षेत्रों के लिए 11 तथा 18 अप्रैल को मतदान हो चुका है। उन्होंने बताया कि तृतीय चरण के मतदान के लिए व्यापक तैयारियां की गई हैं। लोकसभा निर्वाचन के दौरान तृतीय चरण में सबसे अधिक बिलासपुर और रायपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में 25 अभ्यर्थी वहीं सरगुजा लोकसभा क्षेत्र के लिए सबसे कम 10 अभ्यर्थी हैं। साहू ने बताया कि कुल मतदाताओं में 64 लाख 16 हजार 252 पुरूष, 62 लाख 96 हजार 992 महिला तथा 572 तृतीय लिंग के मतदाता शामिल हैं। qqq मीडिया पर चुनाव आयोग की पैनी नज़र निर्वाचन के दौरान मीडिया के गलत उपयोग को रोकने भारत निर्वाचन आयोग ने व्यापक तैयारियां की हैं। चुनाव आयोग ने कहा है कि मतदान दिवस तथा उसके पहले दिन कोई भी प्रत्याशी, राजनीतिक दल अथवा अन्य कोई संगठन राजनीतिक विज्ञापन प्रिंट माध्यमों में प्रकाशित करने के पूर्व मीडिया प्रमाणन समिति से पूर्व प्रमाणन सुनिश्चित करेंगे। इसके लिए भारत निर्वाचन आयोग ने जिला तथा राज्य मीडिया प्रमाणन समिति को प्रमाणन हेतु प्राप्त आवेदन पर त्वरित निर्णय लेने के निर्देश पहले ही दे दिए हैं। भारत निर्वाचन आयोग के परिपत्र के अनुसार प्रदेश में तृतीय चरण के निर्वाचन के लिए 23 अप्रैल तथा उसके एक दिवस पहले 22 अप्रैल 2019 को प्रिंट मीडिया में राजनीतिक विज्ञापन जारी करने से पहले मीडिया प्रमाणन समिति से विज्ञापन का पूर्व प्रमाणन कराना आवश्यक है। इसी प्रकार लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के प्रावधानों के तहत लोकसभा निर्वाचन के लिए पहले चरण का मतदान शुरू होने के 48 घंटे पहले से लेकर लोकसभा तथा विधानसभा निर्वाचन वाले सभी राज्यों में मतदान की समाप्ति के आधा घंटा बाद तक तक मीडिया द्वारा एक्जिट पोल और इसके परिणाम का प्रकाशन-प्रसारण प्रतिबंधित किया गया है। इस अवधि में कोई भी व्यक्ति किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में एक्जिट पोल सर्वेक्षण नहीं कर सकेगा और प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, चलचित्र, टेलीविजन या किसी अन्य माध्यम पर इसके परिणाम का प्रकाशन-प्रसारण नहीं कर सकेगा। इसके अतिरिक्त इस अवधि में किसी भी प्रकार के जनमत सर्वेक्षण की रिपोर्ट का प्रकाशन अथवा प्रसारण भी प्रतिबंधित होगा।
न तो शाह माहौल बना पाए न ही भूपेश
दिग्गज नेताओं की सभा में नहीं जुट रहे लोग
24 घंटे में 112 एमएम बारिश, पानी-पानी हुआ शहर
केलो डेम के 6 गेटों से 400 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड से पानी छोड़ा गया, आज ऑरेंज अलर्ट, प्रशासनिक अमले की 4 टीमें और एसजीआरएफ तैनात
अगले दो दिनों तक भारी बारिश का अलर्ट, हेल्पलाइन नंबर जारी
निम्न दाब और मानसून द्रोणिका बनी हुई है
अलनीनो गॉन तो बारिश फुल ऑन, सावन की शुरुआत में लगेगी बारिश की झड़ी
कमज़ोर हुआ अलनीनो, खरीफ फसल बचाने मज़बूत होगा मानसून
अगले 48 घंटे में रायगढ़ पहुंचेगा मॉनसून
शुक्रवार सुबह जगदलपुर पार कर चुका है मॉनसून, अगले तूफान का नाम होगा छत्तीसगढ़ी शब्द गर्रा
केआईटी की स्थिति गंभीर, अगले सप्ताह बीओजी की बैठक
तकनीकी शिक्षा संचालनालय की टीम पहली बार पहुंची केआईटी
केआईटी को अंधेरे में डुबोने वाला वहां का पूर्व प्राचार्य तोमर
तोमर ने केआईटी की जड़ों में मट्ठा डाला : केआईटी एलुमनी और स्टाफ का आरोप
उमेश पटेलजी बीओजी बैठक केआईटी की समस्या का हल नहीं
10 साल में पांच बार बैठी बीओजी, सिर्फ निर्माण संबंधी ही फैसले लिए
बंद होने की कगार पर जिले का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज केआईटी
1420 सीटों पर 150 छात्र भी नहीं हैं, कॉलेज चलाने के लिए सिर्फ दो महीने का पैसा बचा
विश्व की महान शिक्षक मदर टेरेसा को रायगढ़ से था खास लगाव
शिक्षक दिवस विशेष : संत मदर टेरेसा की पुण्यतिथि भी आज, नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद रायगढ़ ने किया था उनका भव्य स्वागत
विवादों से घिरा चक्रधर समारोह, आयोजन और स्थल को लेकर जिला प्रशासन का अड़ियल रवैया
11 दिन बाद चक्रधर समारोह होना है। आयोजन स्थल की ऊहापोह को खत्म करते हुए कलेक्टर यशवंत कुमार ने रामलीला मैदान में कल टेंट लगाने का पूजन भी कर दिया। विरोध करने लोग आए पर कलेक्टर ने दो टूक कहा कि 14 दिन के लिए अंदर कर दूंगा। फिर भी कुछ लोग मैदान में आयोजन का विरोध कर रहे हैं। रामलीला मैदान बचाओ समिति और भाजपा युवा मोर्चा ने गुरुवार रामलीला मैदान में चक्रधर समारोह के आयोजन के विरोध में कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। गुरू शिष्य परंपरा के अनुसार कलाकारों के चयन करने पर नोडल अधिकारी ने रायगढ़ के कुछ नाम गिनाए और कुछ को सीधे रायपुर से रेफर होना बताया। लेकिन इस बार कितनी पारदर्शिता बरती जाएगी वो पेमेंट के वक्त पता चलेगा। विदित हो कि कुछ खास लोगों को बारंबार चक्रधर समारोह में बुलाने और मोटी रकम देने से जिला प्रशासन की किरकिरी कई दफे हुई है। इस भ्रष्टाचार में जिला प्रशासन, चयन समिति और समन्वय समिति की मिलीभगत थी। जिसने चक्रधर समारोह जैसे बड़े आयोजन की साख पर बट्टा लगाया। प्रशासन से उम्मीद थी कि इस बार भी चयन समिति में पारदर्शिता बरती जाएगी लेकिन ऐसा हो ना सका। भले ही जिला प्रशासन कितना भी राग आलापे इस बार भी चयन समिति में कुछ ऐसे लोग शामिल थे जिनका कला और संस्कृति से कोई सरोकार नहीं है। qqq उप संचालक जनसंपर्क ने कलेक्टर की बात काटी चक्रधर समारोह के संदर्भ में कलेक्टर ने गुरुवार शाम 4 बजे कलेक्टोरेट सभाकक्ष में पत्रकार वार्ता रखी। रायगढ़ एक्सप्रेस के प्रतिनिधि ने कलेक्टर से यह सवाल किया कि चक्रधर समारोह कुछ लोगों के लिए 9 दिन का मौज बन जाता है और जिला प्रशासन उनका पूरा सहयोग करता है, कलेक्टर जवाब दे ही रहे थे कि खुद को फंसता हुआ देख उप संचालक जनसंपर्क उषा किरण बड़ाईक ने कलेक्टर की बात काट दी और सारे सवालों को वहीं खत्म कर दिया। यह सब कलेक्टर के सामने हो रहा था और वो मौन थे। जनसंपर्क के सूत्रों की मानें तो उपसंचालक की भूमिका भी आयोजन को लेकर संदिग्ध रही है। इस कारण खुद को फंसता हुआ देख उन्होंने कलेक्टर का ध्यान भटकाया। विदित हो कि करीब 3 साल से अधिक वर्ष से पदस्थ उषा किरण का अक्सर किसी न किसी से विवाद होता रहा है। बात चाहे साप्ताहिक समाचार पत्रों को विज्ञापन देने की हो या आम चुनाव के दौरान उन्हें पास जारी करने की हो। कुछ खास लोगों से हमेशा घिरी रहने वाली उपसंचालक ने हाल ही में एसडीएम रायगढ़ और डिप्टी कलेक्टर से संबंधित विवादित खबर को भी वाट्स-अप ग्रुप में शेयर किया था। जिसे आधिकारिक पुष्टि माना जाने लगा। विवाद बढ़ने पर सफाई दी कि उनके बच्चे ने गलती से खबर डाल दिया। इस मामले में उन पर कार्रवाई अब तक नहीं हुई है। मजे की बात यह है कि इनका सालभर पहले रायपुर ट्रांसफर हो गया और अभी तक अटैच में जिला जनसंपर्क विभाग में हैं। कौन है नटवर सिंघानिया 9 दिन के चक्रधर समारोह में आपको नटवर सिंघानिया हमेशा एक बड़े रोल में दिखेंगे। अब ये किस हैसियत से आते हैं इसे जिला प्रशासन जाने क्योंकि रायगढ़ की जनता जानती है कि वो कौन है। चक्रधर समारोह को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बताने वाले कलेक्टर यशवंत कुमार भी नटवर सिंघानिया की पहेली नहीं बूझ पाए। रायगढ़ एक्सप्रेस के सवाल पर उन्होंने बताया कि वो राजपरिवार के प्रतिनिधि हैं। इसी हैसियत से वो चयन समिति में है। जबकि चक्रधर समारोह पूर्णत: शासकीय आयोजन है। जिसमें राजपरिवार के शामिल होने की बात ही नहीं है। देश लोकतांत्रिक गणराज्य है ऐसे में राजपरिवार और उसके प्रतिनिधि को जिला प्रशासन कैसे इतनी तवज्जो दे सकता है। qqq अपर कलेक्टर को लगाई फटकार पहले तो राजपरिवार को चक्रधर समारोह में शामिल करना जिला प्रशासन के लिए विवाद का कारण बना हुआ है। कई लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं। उसके बाद राजपरिवार के नाम पर राजनीतिक शरण पाए हुए लोगों को चयन समिति में शामिल करना उसके बाद राजपरिवार के प्रतिनिधि को शामिल करना जिला प्रशासन की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। बल्कि रायगढ़ के राजा विशाल बहादुर सिंह को चयन समिति से लेकर हर समिति से दूर रखा है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बात को लेकर काफी तू-तू मैं-मैं हुई। कलेक्टर राजा विशाल बहादुर को समन्वय समिति में शामिल करने की बात कर रहे थे लेकिन समन्वय समिति की बैठक नहीं हुई थी। इस पर कलेक्टर ने अपर कलेक्टर सुखनाथ अहिरवार को फटकार लगाई। राजा विशाल बहादुर ने रायगढ़ एक्सप्रेस को बताया कि वो 10 साल से रायगढ़ के राजा हैं लेकिन आज तक किसी भी चक्रधर समारोह में उन्हें शामिल नहीं किया गया है। राजा और राजपरिवार के नाम पर जिला प्रशासन हमेशा से पक्षपात करती है। राजनीतिक दल से जुड़े परिवार के कुछ सदस्यों पर जिला प्रशासन हमेशा मेहरबान रहती है जबकि आधिकारिक रूप से राजा मैं हूं और मेरे से कभी कोई संपर्क नहीं करता। qqq सांस्कृतिक भवन एक छलावा राज्य के मुख्यमंत्री हमेशा से कहते आए हैं कि जब सांस्कृतिक भवन बनेगा तब चक्रधर समारोह वहीं होगा। अब जब सांस्कृतिक भवन बन गया है तो समारोह के आयोजन के लिए तरह-तरह की बातें हो रही हैं। जगह कम है लोग कैसे बैठेंगे। क्या ये सवाल सांस्कृतिक भवन बनाने से पहले जिला प्रशासन के जेहन में नहीं आया था। अगर जानकर इसे छोटा बनाया गया है तो फिर यहां चक्रधर समारोह के आयोजन की बात करना भी बेमानी है। रामलीला मैदान में चक्रधर समारोह नहीं होगा इसी चुनावी वायदे से विधायक प्रकाश चुनावी मैदान में उतरे और जीते लेकिन आयोजन वहीं हो रहा है। विधायक झूठे साबित हुए। लोग हमेशा से समारोह के टेंट पर सवाल उठाते रहे हैं। लोगों का आरोप है कि एक टेंट हाउस विशेष को फायदा पहुंचाने के लिए जिला प्रशासन यह पूरा षड़यंत्र रचता है। ऐसे में सांस्कृतिक भवन रायगढ़ के लोगों के लिए छलावा है।
इंदिरा गांधी की इस फोटो ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई पर अमेरिका जाने को किया मना
वर्ल्ड फोटोग्राफी डे पर विशेष : शिवशरण पाण्डेय, जिन्होंने बदल दी रायगढ़ के फोटोग्राफी की परिभाषा
खबरों की बहती बयार के 50 बरस
शहरनामा : मौलिक पत्रकारिता करते हुए रायगढ़ के पहले अखबार बयार की गोल्डन जुबली
नेताजी...!! ड्यूस !! फ़्यूहरर !!
नेताजी का जो मतलब हिंदी में होता है, वही ड्यूस का इटालियन में होता है, और वही मतलब फ़्यूहरर का जर्मन में होता है। आधुनिक भारत के इतिहास में इतना इंट्रेस्टिंग किरदार कोई नही है, जो सुभाष चन्द्र बोस का है। जिनके गांधी के शिष्यत्व से शुरू हुए राजनैतिक आगाज की इंतहा हिटलर से हाथ मिलाने से होती है। उड़ीसा के कटक में पैदा हुए, और रेवेंनशा कालेज से पढ़े सुभाष बचपन से इंटेलिजेंट, तेज तर्रार थे। कलकत्ता में उच्च शिक्षा के बाद कैम्ब्रिज गए। बाप से वादा किया था कलेक्टरी पास करने का, और परीक्षा में चौथी रैंक भी लाये। मगर अंग्रेजों की ताबेदारी करे उनकी जूती.. 1921 में रिजाइन करके भारत लौट आये। चितरंजन दास के प्रभाव में कांग्रेस पार्टी से जुड़े। युवक कांग्रेस प्रेजिडेंट हुए। जेल वेल जाना होने लगा। एक दूसरा युवा नेता भी सीढ़ियां चढ़ रहा था, वैसा ही इंटेलिजेंट, धनी और अंग्रेजीदां। नेहरू से खूब छनी। जब 1927 में एआईसीसी की कलकत्ता बैठक हुई, सारे इंतज़ामात का जिम्मा सुभाष को दिया गया। और भाई ने कमाल कर दिखाया। सारे वालंटियर्स को शानदार वर्दी सिलवाकर दी, उसी अंग्रेज टेलर "हर्मन्स" से जो अंग्रेजो की वर्दियां सीता था। सबके शानदार बूट, बेल्ट , सभी डिग्निट्रीज का स्वागत युवा वालंटियर सेल्युट से करते। अब युवा सुभाष ने बिल्कुल स्टाइलिश योरोपियन स्वैग से प्लान किया था। उस बुड्ढे बापू को पसंद न आया। इस दौरान एक जेल यात्रा के बाद, सुभाष योरोप चले गए। 1933 से 35 का ये पीरियड फासिज्म और नाजी दलों के उभार का था। वे मुसोलिनी से मिले, योरोप में रह रहे भारतीय राष्ट्रवादियों से मिले, ऑर्गनाइज़्ड मिलिशिया से सत्ता प्रयोग सफल हो रहा था। इसी दौरान अपनी एक किताब लिखी। नेशनल सोशलिज्म से प्रभावित सुभाष का ख्याल यही पका कि भारत को भी आजादी और तरक्की के लिए क़माल अतातुर्क जैसे बेनोवेलेंट अथ्रोटोरियन रेजीम की जरूरत है। खैर.. 1935 में वे वापस भारत आ चुके थे। qqq गांधी की ज़िद पर अध्यक्ष पद छोड़ा सुभाष अब तक कांग्रेस के बड़े लीडर्स में गिने जाने लगे थे। हालांकि वो रेडिकल ज्यादा थे, सो गांधी का फेवर नेहरू को ज्यादा था। पार्टी में दोनों लोकप्रिय थे। त्रिपुरी अधिवेशन वे गांधी पर चढ़ाई कर बैठे, खिलाफत करके भी अध्यक्ष का चुनाव जीत गए। गांधी जिद पकड बैठे। सुभाष ने पद छोड़ दिया। रहे कांग्रेस में ही, मगर एक ब्लॉक अलग बना लिया। फारवर्ड ब्लॉक, पेशावर से मद्रास तक उनके समर्थक ब्लॉक से जुड़ गए। दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ। अंग्रेजो ने भारत को शामिल कर दिया। महासभा, आरएसएस और मुस्लिम लीग ने सरकार को समर्थन दिया, कांग्रेस विरोध में थी। कांग्रेस में फारवर्ड ब्लॉक वाले सबसे गर्म विरोध कर रहे थे। अंग्रेजो ने सुभाष बाबू को नजरबन्द कर दिया। अब सुभाष चंद्र बोस का वो समय शुरू होता है, जिसने उन्हें किवदन्ती बना दिया। कब उन्होंने दाढ़ी बढ़ाई, कब खिड़की से कूदकर ट्रेन में बैठकर पेशावर पहुंच गए। वहाँ से गूंगा- बहरा पठान बनकर ( लोकल पश्तो नही आती थी) अफगनिस्तान, वहाँ से रूस पहुंच गए, फिर रोम याने इटली और फिर जर्मनी। मई 1941 में हिटलर से मिले, भारत को आजाद करने के लिए मदद मांगी। रूस की मदद से भारत पर सैनिक हमले का प्रस्ताव था। हिटलर को भारत मे कोई रुचि नही थी। वैसे भी लन्दन जीत लेने पर दिल्ली ऐसे ही उसकी हो जाती। मगर फिलहाल ब्रिटिश को तंग करने का एक हथियार उसे मिल गया था। अफ्रीका में पकड़े गए 3000 भारतीय ब्रिटिश फौजी, प्रिजन कैम्पो में थे। उनका एक इंडियन लीजियन (दस्ता) बनवाने का वादा किया। एक रेडियो स्टेशन खुलवा दिया, जिसमे बोस एन्टी ब्रिटिश भाषण देते, और ब्रिटिश भारतीय फौजो को भारतीयता के नाम पर जर्मनों से नहीं लड़ने का संदेश देते। रहने खाने का इंतजाम ठीक था। बोस ने विवाह भी किया, उसी लड़की से जिससे पिछले बार योरोप दौरे में मुलाकात हुई थी। एक लड़की हुई, नाम रखा अनिता। इंडियन लीजियन के वो लीडर थे। लीजियन वाले अपने लीडर को क्या कहकर पुकारें ? पड़ोस के इटली में मुसोलिनी को "ड्यूस" याने नेता कहते थे, अपने घर याने जर्मन में हिटलर को "माई फ़्यूहरर" याने "मेरा नेता" कहते थे। सुभाष बाबू को भी "हमारे नेता" का प्रस्ताव मिला। उन्होंने "नेताजी" स्वीकार किया। qqq ऐसे बनी आज़ाद हिंद फौज मगर बोस को यह सब रास नही आ रहा था। वे नाजी प्रोपगंडा की विशाल मशीन के महत्वहीन पुर्जे हो गए थे। रेडियो स्टेशन चलाने वो नही आये थे। हिटलर से दोबारा मिलने का अवसर नही मिल रहा था। जर्मनी से बाहर अब वो ब्रिटेन के खासे बड़े एनिमी हो चुके थे। किसी तरह जापान जाने की इजाजत मिली। एक सबमरीन में बैठकर वे मेडागास्कर होते हुए जापान अधिकृत सिंगापुर आये। यहां अलग ही बवाल कट रहा था। जापान पूरा ईस्ट-एशिया कब्जाने के फिराक में था। जहां आप कब्जा करना चाहते हों, वहां की जनता विद्रोह कर दे तो मामला आसान हो जाता है। जापानी चाणक्य लोगो ने सिंगापुर में एक इंडिया लीग बनाई थी, जिसकी लीडरशिप रासबिहारी बोस कर रहे थे, जो खास इफेक्टिव नही थे। सुभाषचंद्र बोस को इसकी कमान दी गयी। युध्द के दौरन पकड़े गए ब्रिटिश भारतीय फौजी उन्हें दिए गए। इस फ़ौज को उन्होंने नया नाम दिया- आजाद हिंद फौज। नया नारा दिया- चलो दिल्ली। तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा, के उद्घोष के साथ आजाद हिंद फौज आगे बढ़ी। सुभाष ने अपने रेडियो सन्देश में भारतीय जनता को भी एड्रेस किया। गांधी को राष्ट्रपिता बताते हुए उनको अपना नेता कहा। फ़ौज में नेहरू ब्रिगेड़, गांधी ब्रिगेड, रानी झांसी रेजिमेंट जैसे नाम दिया। अब पता नही, की गांधी-नेहरू की क्या प्रतिक्रिया थी, मगर पब्लिक दीवानी हो गई। कुछ बड़ा होने वाला है, का फील आया। सुभाष ने सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार बनाई। याने जब कभी ब्रिटिश हारे, तो जापानियों के संरक्षण में यही सरकार दिल्ली में बैठती। हालांकि एटमी हमले के बाद जापानी हार गए। -- सोचता हूँ, जीत जाते तो क्या होता। दिल्ली में फ़्यूहरर.. मेरा मतलब नेताजी की सरकार होती। किंतनी स्वतंत्र होती? क्या उसका इकबाल वैसा ही होता जैसा अंडमान में ढाई साल आजाद हिंद सरकार का रहा?? अंडमानी लोगो ने 1945 में जापानियों/आजाद हिंद सरकार के जाने , और वापस ब्रिटिश राज कायम होने पर चैन की सांस ली थी। दरअसल पूरे दौर में नेताजी के हाथ मे कोई ताकत थी ही नही। उनका सिर्फ इस्तेमाल हो रहा था। नेताजी के देश के प्रति समर्पण पर कोई सवाल उठाया नही जा सकता। मगर 1940 में भारत छोड़ने के बाद वे दुनिया की ईविल ताकतों के हाथ का खिलौना बन गए थे, इसमे भी कोई शक नही। मगर युद्ध और मुहब्बत में सब जायज भी है। और यहाँ तो मामला देश से मुहब्बत का था। (लेखक शिक्षाविद होने के साथ-साथ अंचल के मशहूर समाजसेवी हैं लेख में उनके निजी विचार हैं। )
भाषा जो हमें साथ रहना सिखाती है
हिंदी दिवस : विदेशी लश्करों और भारतीय भाषाओं से उपजी हिंदी कल और आज
सुना है असम के बाद NRC का ये गैंडा देश भर में घुमाने का प्लान है
संदर्भ : आदिवासियों का गढ़ असम और उसकी वर्तमान परिस्थिति
देश के आगे बढ़ने का रास्ता राजीव के रास्ते से होकर गुजरता है
इस दशक का चौथा साल भारत की तासीर बदलने वाला था। देश को नया प्रधानसेवक मिला। जनता का अभूतपूर्व आशीर्वाद बरसा था। आगे पांच साल में हिंदुस्तान को इक्कीसवीं सदी में दुनिया का अगुआ बनाने में का वादा और जिम्मेदारी थी। पहला ही बजट पेश किया टैक्स सुधारों पर, दरें घटी, स्लैब कम हुए। बजट ड्रीम बजट कहलाया और हिंदुस्तान के बड़े प्रतिक्षित टैक्स सुधारों का आगाज किया। आने वाले पांच साल आयात निर्यात सुगम हुआ, टैक्स और कर्ज की दरें घटी। नतीजा, हिंदुस्तान ने पहली बार चार प्रतिशत से ऊपर की ग्रोथ रेट देखी। साल दर साल पांच, छह:, सात, आठ और पांचवा साल आते-आते 10.20 की ग्रोथ हुई। जीरो बेस्ड बजटिंग की शुरुआत हुई, जिसने सरकारी खर्चों पर लगाम कसी । सेंसेक्स 5 साल में दोगुना हो गया। उद्योग बढे, पैसा आया। मगर सरकार के इकबाल बेचकर नहीं। टैक्स चोरी के मामले में बड़े-बड़े उद्योगपति लपेटे में आये। हिंदुस्तान की सबसे बड़ी कम्पनी अम्बानी पर छापे पड़े। प्रधानसेवक ने बता दिया पूंजीपति राज्य की ताकत से ऊपर नहीं, नीचे होता है। गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी के हैंगओवर से दूर, प्रधानसेवक ने लेटेस्ट तकनीक का उपयोग किया। अंतरिक्ष, मिसाइल तकनीक, नए हथियार, विमान हर चीज के लिए देशी संस्थानों को भरपूर मदद मिली। सीमा सुरक्षा के लिए हवन नहीं करवाये, बल्कि वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित कर अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलें बनाई। सरकारी कम्पनियों ने बढ़-चढ़कर हवाई जहाज बनाये। टैंक बनाये, ट्रेनें बनाई। सूचना क्रांति और डिजिटाइजेशन खूब परवान चढ़ा। qqq विकास से जीते जाते हैं चुनाव ! नई शिक्षा नीति आयी। हर जिले में , दूर-दराज के गांव में पार्टी के फाउंडर नेता के नाम से "स्टेट ऑफ दी आर्ट" फ्री स्कूल शुरू किए। जिसमे 2 लाख से अधिक बच्चे 12वीं तक की मुफ्त शिक्षा पाने लगे। देश की पहली ओपन यूनिवर्सिटी बनाई। तीस से अधिक नई यूनिवर्सिटी खोली गई। पहली बार गरीबों के लिए आवास शुरू किए, पहली बार ग्रामीण रोजगार की गारंटी का कार्यक्रम बनाया। सत्ता का केंद्रीकरण खत्म करने के लिए गाँव से शहर तक पंचायतें सक्रिय की, अधिकार और पैसे दिये। देश को विश्व समुदाय के बीच एक नई पहचान दिलाई- "दक्षिण एशिया का अन्डिस्प्यूटेड लीडर" किया ये की बिखरे हुए दक्षिण एशिया के देशों को मिलाकर संगठन बनाया। क्या नेपाल, क्या भूटान, लंका, मालद्वीप, बंगलादेश। कहीं दोस्ती तो कहीं डण्डा, किसी की हिम्मत नहीं चूं करने की। सेना भेजकर छोटे देश की सुरक्षा की, तो हिंदुस्तानी शरणार्थियों पर जुल्म करने वाले देश मे अपनी सेना उतार दी। चीन की आंखों में आँख डालकर देखा, सीमा विवाद पर बातचीत शुरू की। और पाकिस्तान- उससे कश्मीर की सात सौ स्कवेयर किलोमीटर जमीन जीतकर हिंदुस्तान में मिला दी। और फिर पाकिस्तान को न्यूक्लियर नॉन एग्रेशन समझौता करने पर मजबूर किया। इन्ही सब मे पांच साल निकल गए। प्रधानसेवक यह समझ नहीं सके कि चुनाव विकास से नहीं जीते जाते। उपलब्धियां जनता को नहीं रिझाती। राजनीति के कच्चे खिलाड़ी थे। उन्हें पता नहीं था कि असल में जनता को क्या चाहिए। जाति-धर्म पॉलिटिक्स नहीं आती थी। कोशिश की, तो फेल हो गए। मन की बातें करना नहीं आता था, मीडिया मॅनेजमेंट नहीं आता था, इवेंट मैनेजमेंट नहीं आता था। लच्छेदार भाषण नहीं थे, विरोधियों को गाली नहीं थी, किसी को दबाया नहीं था, न प्रोपगंडा की टीम बिठाई थी। अगले पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। जनता का स्पष्ट ख्याल था आदमी बंडा हो, आगे पीछे कोई न हो, तो वो भ्रष्ट नहीं होता। अब यहां तो प्रधानसेवक परिवार वाले थे, पत्नी थी, बच्चे थे, करप्शन तो करेगा ही। तो हुआ वही, जो होना था, दशक के नवें वर्ष में प्रधानसेवक चुनाव हार गए। तीस साल बाद, दशक के चौथे वर्ष में एक और प्रधानसेवक, बड़े मैंडेट के साथ आया। उसे पता था जनता को क्या चाहिए। उसने गवर्नेंस छोड़कर बाकी सब किया। दशक के नवें वर्ष में वह राजीव गांधी की तरह हारा नहीं। मगर पांच वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक ताने बाने और सद्भाव को पलीता लग चुका है। ग्रोथ का आंकड़ा वही है, जो 30 साल पहले, राजीव की शुरुआत के वक्त थी। शायद यहाँ से आगे बढ़ने का रास्ता राजीव के रास्ते से ही होकर गुजरता है। बहरहाल, देश को इक्कीसवीं सदी की बुनियाद देकर जाने वाले राजीव का आज जन्मदिन है। हालांकि चुनावी इतिहास कुछ और कहता हो, पर मेरी नजर में वही विजेता हैं। क्योंकि देश को उनकी दिखाई राह पर चलने की जरूरत आज सबसे ज्यादा हैं। (लेखक शिक्षाविद होने के साथ-साथ अंचल के मशहूर समाजसेवी हैं लेख में उनके निजी विचार हैं। )
हरि बोल, जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ निकली रथयात्रा, देखें गैलरी
रायगढ़ में दो दिनों की रथयात्रा आयोजित होती रही है। इसी क्रम में आज रथ द्वितिया के दिन शहर के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर से भगवान श्री को विधिविधान पूर्वक पूजा अर्चना पश्चात मंदिर के गर्भगृह तथा मंदिर परिसर से जय जगन्नाथ के जयघोष और घंट शंख ध्वनि के बीच ससम्मान बाहर निकाला गया। राजापारा स्थित प्रांगढ़ में मेले सा माहौल था और हजारो की संख्या में श्रद्धालु भक्तगण भगवान श्री के दर्शन करने के लिए पहुंचे हुए थे। इससे पहले कल भगवान जगन्नाथ की विधि विधान से पूजा की गई जिसे फोटोग्राफर वेदव्यास गुप्ता ने अपने कैमरे में कैद किया।
इप्टा रायगढ़ के 25वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की झलकियां
27 से 31 जनवरी तक पॉलिटेक्निक ऑडिटोरिम में इप्टा रायगढ़ द्वारा 25वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। जिसमें चार नाटक एवं दो फीचर फिल्में दिखाई गईं। समारोह की शुरुआत रायपुर के मशहूर रंगकर्मी मिर्जा मसूद को 10वां शरदचंद्र वैरागकर अवार्ड देकर की गई। यह कूवत सिर्फ रंगमंच रखता है जो वर्तमान सत्ता के मठाधीशों पर अजब मदारी गजब तमाशा नाटक के माध्यम से सीधे कटाक्ष कर सकता है। जहां एक मदारी को राजा बना दिया जाता है, शब्दों के अस्तित्व को खत्म कर दिया जाता है। बंदर राष्ट्रीय पशु बन जाता है। गांधी चौक नाटक में गांधीजी की प्रतिमा स्वयं यह चलकर वहां से हट जाती है कि जब रक्षक की भक्षक बन गए तो कोई क्या कर सकता है। नोटबंदी और जीएसटी पर गांव वाले सीधे प्रहार करते हैं। सुबह होने वाली है की लेखी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध होने के बाद लोगों को जागरूक करने को किताब लिखती और किताब को ही फांसी हो जाती है। बोल की लब आजाद हैं तेरे लोगों को दर्शकदीर्घा में झकघोर के रख देती है। तुरूप और भूलन जैसी फिल्में लोगों के मनोरंजन के अलावा दमदार संदेश भी देती है। तो देखें इस शानदार नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की कुछ झलकियां
70 वें गणतंत्र दिवस के फुल ड्रेस रिहर्सल की मनमोहक तस्वीरें
जिले में 70वां गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। गणतंत्र दिवस परेड की फुल ड्रेस रिहर्सल दो दिन पहले की जाती है। महीने भर से चल रही तैयारी को 25 जनवरी के दिन आराम दिया जाता है। इस गणतंत्र दिवस समारोह के रंग को देखिए इन तस्वारों से...
तस्वीरों में देखें 19वें युवा महोत्सव के रंग
खेल एवं युवा कल्याण विभाग एवं जिला प्रशासन द्वारा रायगढ़ स्टेडियम, पॉलीटेक्निक ऑडिटोरिम और न्यू ऑडिटोरियम में तीन दिवसीय 19 वां राज्य स्तरीय उत्सव संपन्न हुआ। जिसमें सूबे के 27 जिलों के युवाओं ने भाग लिया। तीन दिन तक शहर के लोगों को प्रदेश के लोकरंग, लोक संस्कृति, लोक नृत्य की झलक देखने को मिली। तीन दिन चले इस युवा उत्सव की चुनिंदा फोटो को हमने अपनी गैलरी में शामिल किया है।
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