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Thursday, May 06, 2021
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16 तक रायगढ़ हुआ लॉक, आज 1200 से अधिक मिले कोरोना से संक्रमित
कलेक्टर ने कुछ छूट के साथ लॉकडाउन को बढ़ाया, रविवार होगा पूर्ण बंद सिर्फ मेडिकल फेटर्निटी को मिली राहत
आसपास
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सूखे अप्रैल के बाद बदलाव की बदली
मौसम
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1 मई को 6 गांव के निवासियों से 18-45 आयुवर्ग के टीकाकरण अभियान की होगी शुरुआत
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कोरोना संक्रमण रोकने के लिए मितानिन और एएनएम को ग्रामीण क्षेत्र की कमान
आसपास
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कम से कम 10 दिन होम आईसोलेशन में रहना जरुरी
हमारे बच्चे
16 तक रायगढ़ हुआ लॉक, आज 1200 से अधिक मिले कोरोना से संक्रमित
कलेक्टर ने कुछ छूट के साथ लॉकडाउन को बढ़ाया, रविवार होगा पूर्ण बंद सिर्फ मेडिकल फेटर्निटी को मिली राहत
1 मई को 6 गांव के निवासियों से 18-45 आयुवर्ग के टीकाकरण अभियान की होगी शुरुआत
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर अंत्योदय राशनकार्डधारी परिवारों से टीकाकरण की होगी शुरुआत
कोरोना संक्रमण रोकने के लिए मितानिन और एएनएम को ग्रामीण क्षेत्र की कमान
4004 मितानिन, 376 एएनएम समुदाय के बीच कर रही दिन रात काम
ऑक्सीजन बेड बढ़ाने का काम युद्धस्तर पर जारी
केआईटी के फस्र्ट फ्लोर में मशीन से लिफ्ट कर पहुंचाया जा रहा ऑक्सीजन सिलेंडर
स्वच्छता दूतों के साथ नाइंसाफी बर्दाश्त नही: ओपी चौधरी
प्रदेश भाजपा के मंत्री ओपी चौधरी ने आज कलेक्टोरेट के सामने आंदोलनरत स्वच्छताकर्मियों के बीच जाकर उनके आंदोलन का समर्थन किया। साथ में प्रदेश भाजपा के कार्यसमिति सदस्य गुरुपाल सिंह भल्ला एवं जिला भाजपा के प्रवक्ता मनीष शर्मा भी आंदोलन के समर्थन में खड़े नजर आये। स्वच्छताकर्मियों का साथ देते हुए ओपी चौधरी ने कहा कि यह प्रदेश सरकार की मंशा को स्पष्ट कर रही है कि उनको, इनके साथ हो रहे अन्याय से कोई सारोकार नहीं। हम सभी जानते है कि हमारा विश्व कोविड-19 जैसे भयंकर महामारी से जुझ रहा है ऐसे विपरित परिस्थितियों में जब मानव स्वंय अपने सगे संबंधियों से दुरी बनाकर रहने में विवश है, पुत्र अपने पिता की अर्थी को कांधा नही दे पा रहा, प्रकति के साथ हुये छेड़छाड़ का दंड हम सभी ने भोगा। ऐसे कठिन दौर में हमारी सेवा के लिये यदि कोई खड़ा है तो वह है हमारे स्वच्छता दूत एवं स्वास्थ्य दूत। आज भूपेश राज में हमारे यह स्वच्छता दूत अपने लिये इंसाफ मांगने, धरने में बैठने को मजबूर है। कोरे वादे एवं झुठ की बुनियाद डालकर इन्होने सत्ता रूपी इमारत खड़ी करी है तो इनका हृदय भी उसी तरह कठोर हो चला है। जो इनको स्वच्छता दूतों की तकलीफ नजर नहीं आ रही। आज जिला भाजपा की बैठक में रायगढ़ आये ओपी चौधरी को जैसे ही स्वच्छताकर्मियों के आंदोलन की खबर लगी वे तत्काल धरना स्थल में पहॅुचकर स्वच्छता कर्मियों की व्यथा सुनी। स्वचछता कर्मियों ने बताया कि राज्य आपदा मिशन निधीमत अंतर्गत इन्हे 29.09.2020 से स्वच्छताकर्मी पद मेडिकल कॉलेज रायगढ़ में नियुक्त किया गया है। वो भी ऐसे कठिन दौर में जब मानव समाज एक छोटे से अदृश्य वायरस के डर से घरों में कैद था ,ये अपना सामाजिक कर्तव्य निभाने, इन पदों में कार्यरत हुये परंतु अब स्थिति पहले से बेहतर है तो इन्हे इनके कार्यो से मुक्त किया जा रहा है। स्वच्छता कर्मियों की टीम को महसूस कर ओ.पी. चौधरी ने तत्काल जिला प्रशासन के मुखिया से बात की और आंदोलनरत स्वच्छता दूतों को इनसे मिलवाया। कड़े लहजे में ओपी ने कहा कि इनके साथ हो रही नाइंसाफी हमें मंजूर नहीं यदि जिला प्रशासन तत्काल इनके आवेदन पर सहानुभूति पूर्वक विचार नहीं करती तो पूरी भाजपा मुखर होकर इसके लिये आंदोलन करेगी। इन्होने कहा कि सर्वप्रथम कल ही इन स्वच्छता दूतों को कोरोना वैक्सीन की पहली डोज दी जाये। केन्द्र सरकार की मंशा कोरोना वैक्सीन को लेकर बेहद स्पष्ट है कि स्वास्थ्य कर्मचारी एवं स्वच्छताकर्मियों को पहले चरण में ही वैक्सीन लगना है परंतु हमने कोरोना काल के प्रथम माह से ही प्रदेश सरकार की विपरीत कार्यप्रणाली को देखा है इनकी इच्छाशक्ति है ही नही कि ये इस भयंकर महामारी से लड़ सकें। प्रदेश कार्यसमिति सदस्य गुरुपाल सिंह भल्ला ने भी इनको आश्वस्त करते हुये कहा कि मै पूरी उर्जा के साथ आप लोगो को न्याय दिलाने हेतु संघर्ष करुंगा।
लैंड, सैंड, कोल और लीकर माफिया की है कांग्रेस सरकार : डॉ. रमन सिंह
पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भूपेश सरकार पर लगाए गंभीर आरोप, बोले – इनके राज में छत्तीसगढ़ की हर एक चीज बिकाऊ है
धान खरीदी को लेकर सड़क पर उतरी भाजपा
ओपी चौधरी बोले- आगामी दिनों में आंदोलन और तेज होगा, तानाशाह हो गई है कांग्रेसी सरकार - सांसद गोमती साय
शराबबंदी सभी के सहयोग से संभव : सीएम भूपेश बघेल
मुख्यमंत्री ने नये साल में रायगढ़ जिले को दी 1146 करोड़ रूपये के विकास कार्यों की सौगात
सूखे अप्रैल के बाद बदलाव की बदली
प्रदेश में कुछ स्थानों पर हल्की वर्षा की संभावना
सामान्य रहेगा मॉनसून : लॉन्ग पीरियड एवरेज का 98% रहने का अनुमान
मॉनसून 2021 का पहला पूर्वानुमान जारी, रायगढ़ एक्सप्रेस के मौसम विशेषज्ञ रितेश शर्मा से समझें रिपोर्ट
तरावट रहेगी जारी मौसम रहेगा कूल
मध्य और उत्तर छत्तीसगढ़ में ओलावृष्टि होने की संभावना
गर्मी से मिल सकती है राहत
गरज के साथ बारिश की संभावना
कम से कम 10 दिन होम आईसोलेशन में रहना जरुरी
होम आईसोलेशन के लिए संशोधित दिशा-निर्देश जारी, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने दिए निर्देश, होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों को रेमेडेसिवीर इंजेक्शन इस्तेमाल नहीं करने की सलाह
कोरोना की रिपोर्ट आते तक लक्षण के आधार पर ले सकते हैं कोरोना की दवा
राज्य स्वास्थ्य विभाग ने आइवरमेकटिन, डाक्सीसाइक्लिन और पैरासिटामॉल लेते रहने की दी सलाह
डॉक्टरी सलाह न मानना साबित हुआ जानलेवा
कोविड टेस्ट की सलाह पर डॉक्टर बदल लिया लेकिन नही करवाया टेस्ट
कोरोना पीड़ितों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ भी दी जाएंगी
सीएमएचओ और सिविल सर्जन को जारी किया पत्र
डॉ. रूपेंद्र पटेल और ताराचंद्र पटेल ने डब्ल्यूएचओ की थीम को किया चरितार्थ
विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष : 8 माह की गर्भवती और दो बार कोविड पॉजिटिव डीपीएम सभी के लिए सीख
रायगढ़ की पैडवूमन मोनिका, स्वच्छ भारत मिशन की झंडाबदार
विश्व महिला दिवस पर विशेष : कोरोनाकाल में गांव-गांव के क्वारंटाइन सेंटर्स में बांटा सैनेटरी पैड
रायगढ़ की मदर टेरेसा प्रतिमा : आदिवासी क्षेत्र में 1,000 से अधिक करा चुकी हैं संस्थागत प्रसव
विश्व महिला दिवस पर विशेष :लोगों के प्रति सेवा भाव कम न हो इसलिए नहीं की शादी- प्रतिमा
साहित्यवाचस्पति पुरातत्वविद कवि लोचन प्रसाद पाण्डेय देश की अनमोल धरोहर
पुण्यतिथि पर विशेष : सम्मान पुरस्कार यशोकीर्ति और धन पांडेय जी के लिए सर्वथा महत्वहीन थे
परंपरा, आधुनिकता और स्त्री का अंर्तद्वंद्व
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के स्त्री के परिधान को लेकर एक बयान पर काफी बवाल मचा हुआ है खासकर फटी जींस पहनी एक एनजीओ चलाने वाली स्त्री पर उनकी टिप्पणी। उन्होंने तो फटी जींस ही कहा है, मेरे व्यक्तिगत विचार से तो चीथड़ों में लिपटी हुई आधुनिकाएं ज्यादा उपयुक्त शब्द है। हालिया खबर यह है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने अपने बयान पर माफी मांग ली है और कहा है किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना उनका मकसद कतई नहीं था। चलिए किस्सा खत्म हुआ क्योंकि यही उनका उद्देश्य था जो पूरा हो गया, सवाल यह है कि हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने वाली और स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित बयानबाजी करने वाली स्त्रियां मुझे स्त्री विमर्श पर संवेदित होने वाली महिलाएं कभी नहीं लगती। जया बच्चन जी का ही उदाहरण लें तो उन्हीं के पार्टी प्रमुख ने कभी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर कहा था कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। ऐसे बेशर्म वक्तव्य पर जया जी की मुखरता कहां लुप्त हो गई थी। हमारे अपने प्रदेश की महिला आयोग की अध्यक्षा का यह कहना कि उत्तराखंड के सीएम का बयान एक घटिया और कुंठित बयान है अध्यक्षा ने तो स्त्री के घुटनों पर फटी जींस और पुरुषों के घुटनों तक पैंट की आपसी तुलना तक कर डाली, बेहद हास्यास्पद और असंगत लगी यह तुलना जो उनके मानसिक प्रदूषण को दर्शाती है। खुद उनके अपने प्रदेश में स्त्री का क्या स्थिति है यह बेहतर जानती हैं। स्त्री हमारे समाज में हमेशा से पूज्यनीय रही और रहेगी। यह और बात है कि चंद दकियानूस लोग उसके चरित्र का आकलन पहनावे या ओढ़ावे से करते हैं। पहनने की आजादी अगर स्त्री को है तो उस पर टीका टिप्पणी भी अभिव्यक्ति की आजादी के अंदर ही आएगी। यदि मुख्यमंत्री जी ने ऐसी टिप्पणी की भी तो वह हिंदू संस्कृति और उसके सांस्कृतिक परिवेश को लेकर की होगी जिस पर तमाम स्त्री वर्ग से प्रतिक्रियाएं उठनी शुरू हो गईं। ऐसी 90 फीसदी महिलाएं खुद अपने परिवार में परंपरागत परिधानों को त्याग कर फटी जींस (चीथड़ों) पहनकर विवाह मंडप में बैठेगी या विवाह संपन्न करेगी उस दिन यह स्त्री स्वातंत्र्य का नायब नमूना पेश करेगी लेकिन नहीं शायद ऐसा कभी ऐसा संभव ही नहीं हो पाएगा क्योंकि फैशन के तौर पर ऐसे चीथड़े पहनने वाली स्त्रियां आधुनिकता का प्रतीक मानती हैं लेकिन मानसिक तौर पर वह कतई आधुनिक नहीं होती। चंद अंगुलियों पर गिनती की जाने वाली युवतियों को छोड़ दें तो तमाम स्त्रियों के भीतर एक ऐसी स्त्री हमेशा से मौजूद होती है जो अपनी परंपराओं की मर्यादा को जानती है उसके सौंदर्य पक्ष को ताकतवर होकर अनुशाषित ढंग से संवारती भी है उसे पता है कि फटी जींस पहनकर जीवन के लंबे कालखंड की पारी नहीं खेली जा सकती। अंत में एक सवाल : क्या ऐसे मंहगे चीथड़े पहनकर अपना वैभव प्रदर्शन करना उन गरीबों के साथ एक भोंडा मजाक नहीं है जिनके नसीब में ही चीथड़े पहनना लिखा है। (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
महज देह नहीं है स्त्री
लंबाई×चौड़ाई=क्षेत्रफल, यह स्कूली शिक्षा में पता चला। लंबाई×चौड़ाई=क्षेत्रफल, महाविद्यालयीन शिक्षा में एक कदम बढ़कर यह ज्ञान मिला कि किसी देश का भौगोलिक क्षेत्रफल जितना बड़ा होगा उसकी प्रभुता और शक्ति उतनी ही बड़ी होगी। यह सब किताबी ज्ञान है और असल जिंदगी किताबी ज्ञान से बिल्कुल अलग होती है। जिंदगी की किताब का पहला पन्ना पटलते ही पता लगा कि लंबाई और चौड़ाई का क्षेत्रफल स्त्री देह भी होती है। यह भी जाना कि स्त्री का भूगोल महज उसकी देह होती है और उसकी परिधि ही उसका प्रथम परिचय है, उसका यह भूगोल ही उसके भूत-वर्तमान और भविष्य का इतिहास है। यह नहीं जाना कि इस स्त्री देह में जो रक्त बहता है, जो आत्मा स्पंदित होती हैं या जो कामनाएं पनपती हैं वह पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं ईश्वर ने स्त्री और पुरुष की संरचना में फर्क जरूर किया है और यह फर्क स्त्री की बेहतरी के लिए किया। उसे सृजनात्मक शक्ति दी तो साथ में सेवा, सुश्रुषा और वात्सल्य जैसे गुण दिए जिन गुणों को पुरुषों को सीखना पड़ता है वह स्त्री के नैसर्गिक गुण होते हैं और उसके इसी नैर्सिगक गुणों का बेजा इस्तेमाल समाज ने या और स्पष्ट कहें तो पुरुष किया जो वर्तमान में भी जारी है। अखबारों में आज जब हम पढ़ते हैं कि एक ऑटोचालक की बेटी मिस इंडिया बनी या अमिताभ बच्चन के गेम शो में अलग-अलग वर्गों से आईं चार स्त्रियां करोड़पति बनी या फिर पहली बार हमारे देश की युवतियां फाइटर प्लेन उड़ाएंगी तो बड़े गर्व की अनूभूति होती है। जिसे हम महिला सशक्तिकरण की दिशा में हो रहे सार्थक प्रयास मानते हैं। पर रूकिये जरा हम अपने देश के इतिहास को खंगाले तो पाएंगे आज से 75 या 80 वर्ष पूर्व भी हमारे देश की नारियां ऐसे कार्य कर चुकी हैं। चाहे वह आजाद हिंद फौज के स्त्रियों की टुकड़ी हो जो छापामार युद्ध से लेकर जासूसी में निषनात थीं, स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय रही थी या शिक्षा की अलख जगाती रहीं। समर्थवान होने पर सामाजिक कार्य तक संपन्न किए हैं और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध भी संचालित किए हैं। फिर यह अचानक क्या हुआ हमें फिर से महिला सशक्तिकरण की जरूरत महसूस होने लगी। दरअसल जब से हमारी संस्कृति पर बाजारवाद हावी हुआ तब से बाजार की ताकतों ने समाज को अपनी उंगलियों पर कठपुलियों की तरह नचाने पर मजबूर कर दिया जिसकी शिकार स्त्रियां ही अधिक हुईं और पुरुष उसके माध्यम बन गए। आधुनिकता के नाम पर बाजार ने स्त्री को ढाल बनाकर जो फूहड़ता परोसी उसे स्त्री आजतक नहीं समझ पाई। भाषा, कपड़े, साहित्य, मनोरंजन आदि सभी क्षेत्रों में नकली आधुनिकता का ताना-बाना बुना गया उसने स्त्री के सोचन-समझने की क्षमता का अपहरण कर लिया ऐसी आधुनिकाएं जब स्वतंत्रता का झंडा लेकर उच्श्रृंखलता का प्रदर्शन करती हैं तो यह छद्म नारीवाद है। महज अपनी भाषणों में स्त्री स्वतंत्रा के नारे लगाने वाली ये सूडो फेमिनिस्ट महिलाएं पर जब बात जमीन पर उतरने की आती है तब उन्हें भी पुरुषों के बैसाखी की जरूरत होती है। यहां उल्लेख करना चाहूंगी हिंदी के प्रख्यात लेखक गजानंद माधव मुक्तिबोध से किसी ने पूछा था कि यह दुनिया क्यों टिकी है तब उनका जवाब था दुनिया स्त्री-पुरुषों के संबंधों के कारण टिकी है, जिस दिन स्त्री-पुरुष संबंध समाप्त हो जाएंगे, दुनिया खत्म हो जाएगी। यहां मुक्तिबोध का आशय जिस संबंध से वह महज दैहिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक-आध्यात्मिक संबंधों से है जो देह से बहुत ऊपर है। इसे वर्तमान में स्त्री से ज्यादा पुरुषों को समझने की जरुरत है और जिस दिन यह बात उन दोनों के समझ में आ जाएगी, दुनिया फिर खूबसूरत हो जाएगी। स्त्री के साथ होने वाली हिंसा स्वंय कम हो जाएंगे। स्त्रियां यह बात समझ चुकी हैं बस पुरुष का अहंकार इसे समझ नहीं पा रहा है। (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
हैप्पी मदर्स डे केलो....
नदी पूज्यनीया होती हैं इनकी पूजा अस्वाभाविक नहीं है, ऐसी पूजा तो प्रतिदिन होनी चाहिए। हमारे देश के अनेक जगहों पर इस तरह की पूजा संपन्न भी की जाती हैं। इसी कड़ी में हमारे जिले की जीवन रेखा केलो नदी भी पूजा और श्रद्धा की हकदार है, इसके किनारे बसे सैकड़ों गांव और शहर इससे अपनी जरूरतें पूरी करते हैं। वैसे ही केलो नदी की अपनी जरूरत होती है अगर केलो नदी हमें जीवन देती है तो उसके अस्तित्व को बचाए रखने का दायित्व किसी और का नहीं बल्कि हमारा ही है। साल के एक दिन नदी की पूजा और आरती करते हुए हमें इस बात पर भी सोचना होगा कि साल के शेष दिनों में हमारा बर्ताव उसके प्रति क्या है? यह जगजाहिर है कि केलो का अस्तित्व खतरे में है औऱ इसे बचाने की एक ईमानदार कोशिश हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में होनी चाहिए। इसलिए हमें अपने आप से सवाल पूछना होगा कि केलो को इस दुर्दशाग्रस्त अवस्था में लाने में हमारी अपनी भूमिका क्या रही है? यहां जब हम अपनी बात करते हैं तो उसका दूसरा अर्थ हमारे जनप्रतिनिधियों से होता है जिन्हें हम विश्वास के साथ पंचायतों से लेकर संसद तक भेजते हैं कि वे हमारे हित-अहित का ध्यान रखें और अपने उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से हमारे दुख और तकलीफों का समाधान निकालें। महज एक दिन की महाआरती और शेष दिन की उदासीनता एक ज्वलंत मुद्दा है उन सभी के लिए। अब यदि बात केलो नदी की करें तो इतिहास यह बताता है कि लैलूंगा के पहाड़ लुड़ेग नामक ग्राम की घाटियों से निकली यह नदी लगभग 190 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। जानकार यह भी बताते हैं कि किसी समय यह मध्य भारत की एक स्वच्छ जल वाली नदी थी क्योंकि जल शुद्धिकरण हेतु जितने खनिजों की आवश्यकता होती है वह सब नैसर्गिक रूप से इसके प्रवाह के रास्ते में मौजूद थे। आज भी रायगढ़ के कई वृद्ध या बुजुर्ग स्त्रियां गवाह होंगे कि कार्तिक माह में जब वे पूजन और दीप प्रवाह के लिए केलो के घाट में जाती थीं तो तकरीबन ऐसा प्रतीत होता था कि स्वंय आसमान जमीन पर आ गया हो। साफ स्वच्छ केलो में तैरते सैकड़ों प्रज्जवलित दीप की छटा रमणीय होती थी। यह कोई अतीत की नहीं महज 20-25 वर्ष पूर्व की बात है। औद्योगिकीकरण के चलते और उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट को केलो में प्रवाहित करने के चलते केलो प्रदूषित होती ही गई और यह सिलसिला आज भी निरंतर जारी है। जनप्रतिनिधि आए-गए उनके द्वारा लुभावने वादों का सपना भी बुना गया लेकिन कमी जो रही वह थी एक फौलादी ईमानदार कोशिश की। एक बार निगम ने कोष्टा पारा में 2010 के आसपास वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया था जो बमुश्किल 10 दिन चला होगा और उसके बाद आजतक बंद है। 14 जनवरी को संपन्न होने जा रहे इस मेगा शो की तैयारी महज उसके तीन चार तीन पहले और शो के दो-तीन दिन बाद तक सिमट कर रह जाती है। यदि हम कहें कि केलो आज मरणासन्न अवस्था में है तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी इसमें रहने वाली कई जलचर प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और जो मौजूद हैं वो तकरीबन विलुप्ति के कगार पर है। नदी में मौजूदा पानी की स्थिति यह है कि नहाने पर कई चर्म रोगों का खतरा है। इसकी दशा अब भी न संभली तो आने वाले समय में रायगढ़ शहर में जल संकट की नौबत आ सकती है। लाखों रुपये खर्च कर हजारों की भीड़ इकट्ठी कर ऐसे मेगा शो के आयोजन के माध्यम से हम अपनी उत्सवधर्मी मानसिकता का परिचय देकर भले ही ताली बटोर लें लेकिन इसे केलो के साथ एक क्रूर मजाक कहना होगा, यह मेरी अपनी राय है। बल्कि, मेरी तो गुजारिश है यहां के जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों से कि वे बिलासपुर अरपा नदी के संरक्षण के लिए गठित अरपा विकास प्राधिकरण की तरह केलो विकास प्राधिकरण बनाने की मांग शासन के पास रखे ताकि अंतिम सांसे ले रही केलो को नया जीवन मिल सके। तब तक के लिए मनाने और देखने वालों की तरफ से हैप्पी मदर्स डे केलो मईया...364 दिन बाद फिर मिलेंगे हालत शायद और बदतर हो जाए या कुछ सुधर भी जाए। हम दोनों का मिलना तो नियति है। (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
वायु प्रदूषण के चलते कोविड-19 मरीज़ों की मृत्यु दर में इजाफ़ा
वायु प्रदूषण - कोराना महामारी के लिए गंभीर खतरा, प्रशासन को सचेत होने की जरूरत है
कलेक्टर भीम सिंह ने भारी बारिश के बीच संभाला मोर्चा, देखें तस्वीरें
निगम अमला बीती रात से आयुक्त के साथ पूरे शहर में डटा हुआ है
तस्वीरों में देखें रायगढ़ में जनता कर्फ्यू का असर
22 मार्च यानी रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर जिले में भी जनता कर्फ्यू का असर देखने को मिला। दोपहर तक पूरा शहर स्वस्फूर्त बंद था। हर मुख्य मार्ग और बाजार बंद मिले। गली-कूचे तक कोई व्यक्ति बाहर नहीं निकला।
हरि बोल, जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ निकली रथयात्रा, देखें गैलरी
रायगढ़ में दो दिनों की रथयात्रा आयोजित होती रही है। इसी क्रम में आज रथ द्वितिया के दिन शहर के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर से भगवान श्री को विधिविधान पूर्वक पूजा अर्चना पश्चात मंदिर के गर्भगृह तथा मंदिर परिसर से जय जगन्नाथ के जयघोष और घंट शंख ध्वनि के बीच ससम्मान बाहर निकाला गया। राजापारा स्थित प्रांगढ़ में मेले सा माहौल था और हजारो की संख्या में श्रद्धालु भक्तगण भगवान श्री के दर्शन करने के लिए पहुंचे हुए थे। इससे पहले कल भगवान जगन्नाथ की विधि विधान से पूजा की गई जिसे फोटोग्राफर वेदव्यास गुप्ता ने अपने कैमरे में कैद किया।
इप्टा रायगढ़ के 25वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की झलकियां
27 से 31 जनवरी तक पॉलिटेक्निक ऑडिटोरिम में इप्टा रायगढ़ द्वारा 25वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। जिसमें चार नाटक एवं दो फीचर फिल्में दिखाई गईं। समारोह की शुरुआत रायपुर के मशहूर रंगकर्मी मिर्जा मसूद को 10वां शरदचंद्र वैरागकर अवार्ड देकर की गई। यह कूवत सिर्फ रंगमंच रखता है जो वर्तमान सत्ता के मठाधीशों पर अजब मदारी गजब तमाशा नाटक के माध्यम से सीधे कटाक्ष कर सकता है। जहां एक मदारी को राजा बना दिया जाता है, शब्दों के अस्तित्व को खत्म कर दिया जाता है। बंदर राष्ट्रीय पशु बन जाता है। गांधी चौक नाटक में गांधीजी की प्रतिमा स्वयं यह चलकर वहां से हट जाती है कि जब रक्षक की भक्षक बन गए तो कोई क्या कर सकता है। नोटबंदी और जीएसटी पर गांव वाले सीधे प्रहार करते हैं। सुबह होने वाली है की लेखी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध होने के बाद लोगों को जागरूक करने को किताब लिखती और किताब को ही फांसी हो जाती है। बोल की लब आजाद हैं तेरे लोगों को दर्शकदीर्घा में झकघोर के रख देती है। तुरूप और भूलन जैसी फिल्में लोगों के मनोरंजन के अलावा दमदार संदेश भी देती है। तो देखें इस शानदार नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की कुछ झलकियां
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