raigarh express

Raigarh Express, news of raigarh chhattisgarh

Thursday, December 09, 2021
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ठंड की शुरुआत के बीच पूर्वी तट पर जवाद की आहट
कल बनने और 4 को ओड़िशा से टकराने की आशंका
मौसम
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14,400 टेस्ट में से मिले 34 एड्स मरीज
हमारे बच्चे
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बुलु दा : चियर्स टिल वी मीट अगेन
हमारे बच्चे
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अब हम लोग क्या करें सुभाष भैया ?
हमारे बच्चे
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नंदकुमार पटेल की याद में पूरी छत्तीसगढ़ कांग्रेस पहुंची खरसिया
राजनीति
जिला सेनानी ने किया पटाखा दुकानों का निरीक्षण
फायर सेफ्टी संचालन का दिया गया प्रशिक्षण
96 प्रतिशत से अधिक लोगों ने लगवाया कोविड का दूसरा डोज
शत प्रतिशत टीकाकरण की ओर अग्रसर रायगढ़
देश का सम्पूर्ण कोविड टीकाकृत पहला जिला बनने की राह पर रायगढ़
तमनार और बरमकेला में 100 प्रतिशत से अधिक लोगों को लगा टीका
एनटीपीसी के रेल प्रोजेक्ट से परेशान एक दर्जन से अधिक गांव
500 एकड़ की फसल प्रभावित, ट्रेन से कटे 5 ग्रामीण
नंदकुमार पटेल की याद में पूरी छत्तीसगढ़ कांग्रेस पहुंची खरसिया
8 साल बाद आया 8 नवंबर : स्व. नंदकुमार पटेल की प्रतिमा का हुआ अनावरण, विशाल जनसभा का भी आयोजन
प्रदेश में बदले जा सकते हैं कुछ जिलों के कलेक्टर
कानून-व्यवस्था दुरुस्त रखना केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, कलेक्टर्स की भी है : भूपेश बघेल
पूर्व विधायक युद्धवीर सिंह का निधन
लीवर की समस्या के चलते वैंटिलेटर पर थे छोटू बाबा
खाद की कालाबाजारी में सहकारिता और विपणन विभाग भी जिम्मेदार !
डीडीए की अनुशंसा पर नहीं होती कार्रवाई, सहकारिता विभाग की शह पर सोसायटियों की मनमानी जारी
ठंड की शुरुआत के बीच पूर्वी तट पर जवाद की आहट
कल बनने और 4 को ओड़िशा से टकराने की आशंका
भादो की सिल्वर लाइनिंग : बारिश होने से अकाल से बचने की उम्मीद
आने वाले एक हफ्ते में जिले में अच्छी बारिश की उम्मीद
मानसून एक्टिव होने की संभावना
मानसून 10 जुलाई के आसपास पुनः सक्रिय होने वाला था किंतु मानसून के साथ अनसरटेनिटी जुड़ी होती है इसलिए सारे अनुमानों को धरा करते हुए पिछले 10 दिन लोगों के लिए गर्मी उमस से बेहाल करने वाले थे, इस दौरान वायरल के विक्टिम्स काफी दिखाई दिए । अब फाइनली मौसम विज्ञान विभाग ने अच्छी बारिश की संभावना जताई है । मौसम विज्ञान विभाग रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर एच पी चन्द्रा के अनुसार मानसून द्रोणिका के पश्चिमी भाग बीकानेर, रोहतक और सुल्तानपुर होते हुए 0.9 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है जबकि पूर्वी भाग हिमालय की तराई में स्थित है। (पूर्वी भाग के हिमालय की तराई में चले जाना ही मध्य भारत के लिए मानसून ब्रेक कहलाता है, इसके कारण एक दो स्थानों पर हल्की वर्षा ही होता है) एक चक्रीय चक्रवाती घेरा दक्षिण तटीय आंध्र प्रदेश और उसके आसपास 1.5 किलोमीटर से 4.5 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है। प्रदेश में कल दिनांक 19 जुलाई को आने की स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा होने अथवा गरज चमक के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। प्रदेश में एक-दो स्थानों में गरज चमक के साथ वज्रपात होने की भी संभावना है। प्रदेश में अधिकतम तापमान में विशेष परिवर्तन होने की संभावना नहीं है। कल के बाद अधिकतम तापमान में 20 जुलाई तक गिरावट होने की संभावना है। 20 जुलाई से प्रदेश के अधिकांश स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा होने अथवा गरज चमक के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। 20 जुलाई और उसके बाद प्रदेश के एक-दो स्थानों पर गरज चमक के साथ वज्रपात होने तथा भारी वर्षा होने की भी संभावना है। 31 फीसदी कम बरसा पानी मौसम विज्ञान विभाग द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार रायगढ़ जिले में मानसून सीजन में बीते कल तक 443.7 मिमी औसत के मुकाबले 306.4 मिमी बारिश ही दर्ज की गई है जो 31 फीसदी कम है खरीफ किसान चिंतित हैं , बेसिन सिंचाई वाली धान की फसल के लिए अभी तत्काल बारिश जरूरी है । आने वाले कुछ दिनों में रायगढ़ में तापमान के थोड़ा कम होने एवं अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान लगभग 32 एवं 23 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है।
मानसून रिवाइवल : आगामी 48 घंटों के लिए ऑरेंज अलर्ट
बीते कई दिनों से हो रही उमस से जिले को राहत मिलने की उम्मीद है। मौसम विभाग ने आगामी 48 घंटों में अच्छी बारिश होने की संभावना जताई है। रायगढ़ जिले के लिए ऑरेंज अलर्ट भी जारी किया है। मौसम विज्ञान विभाग रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर एच पी चंद्रा के अनुसार एक चक्रीय चक्रवाती घेरा उत्तर पश्चिम बंगाल की खाड़ी और उससे लगे तटीय उड़ीसा और तटीय पश्चिम बंगाल के ऊपर 4.5 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है। एक द्रोणीका पंजाब से उत्तर पूर्व बंगाल की खाड़ी तक हरियाणा, दक्षिण उत्तर प्रदेश, दक्षिण पश्चिम बिहार, झारखंड और गंगेटिक पश्चिम बंगाल होते हुए माध्य समुद्र तल पर स्थित है। एक चक्रीय चक्रवाती घेरा उत्तर-पूर्व उत्तर प्रदेश के ऊपर 1.5 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है। एक द्रोणिका उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी और उससे लगे तटीय उड़ीसा और पश्चिम बंगाल से दक्षिण तटीय आंध्र प्रदेश तक 3.1 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है। कल दिनांक 9 जुलाई को प्रदेश के अधिकांश स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा होने अथवा गरज चमक के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। प्रदेश में गरज चमक के साथ कुछ स्थानों पर भारी वर्षा होने, एक-दो स्थानों पर अति भारी वर्षा होने तथा वज्रपात होने की संभावना है। प्रदेश में अधिकतम तापमान में मामूली गिरावट संभावित है। भारी वर्षा का क्षेत्र मुख्यतः मध्य और दक्षिण छत्तीसगढ़ रहने की संभावना है।
14,400 टेस्ट में से मिले 34 एड्स मरीज
कोरोना काल में भी जारी है एड्स की काउंसिलिंग
बुलु दा : चियर्स टिल वी मीट अगेन
भगवान को अचानक हमेशा के लिए किसी को अपने घर बुलाने से पहले उसके घरवालों को खबर कर देनी चाहिए कि यह आखिरी बार है, आगे मिलना न होगा। कम-से-कम जानेवाला भी विदाई लेकर और देकर जाए। मैं बुलु दादा का सगा भाई नहीं हूं, दूर का रिश्ता भी नहीं था हमारा पर जब भी वे रायगढ अपनी तैनाती की जगह पर से लौटते मुझे भी पांच सौ रुपए देते। यह उनके विदा होने का शगुन होता। मेरे दोस्त विकल्प पटनायक को भी इतने ही मिलते, जो रिश्ते में उनका भाई है। उसके सारे भाई मेरे अपने भाई हैं। दोस्तों की नज़रों में मैं बुलु-बुबलु दादा के मम्मी पापा का दत्तक पुत्र हूँ। अपने लिए जिये तो क्या जिये, यह उनको गुनगुनाते सुना था बाद में कई बार सुना,अकेले, बहुत बार , पिछले 11 दिन में कई बार । उनसे मिलने पर जब वो बोलते थे तो सब सुनते थे बहुत जिज्ञासा से छत्तीसगढ़ी-हिंदी-अंग्रेजी जार्गन्स सब सहजता से पैरलल यूज़ करते थे(ये तो खानदानी गुण है)। डिफेंस-डि"वॉर"-डोवाल सब मुद्दे, गीत संगीत, हमारे लिए उस ऊपर लेवल की लिमिटेड खिड़कियों में से शायद सबसे बड़ी खिड़की थे, कुछ मामलों में बेंचमार्क बनने लायक । साल के कुछ खास दिनों में हम खास तरह की भावना से ओतप्रोत रहते है, माता, पिता, भाई, बहन सबके लिए खास दिन होते हैं साल में। 15 अगस्त 26 जनवरी को हम जब सेना के बारे में सोचते हैं तो हमारे सराउंडिंग में बस यही एडजैसेन्ट परिवार है जो तीन पीढ़ीयों से एक उदाहरण है । दुख/सदमे के क्वान्टिफिकेशन की बात करें तो मैं ये सोचता हूँ कि जब मैं इस जाने इतना ऐसा महसूस कर रहा तो घर के लोगों की क्या हालत होगी यह सोच के परे है। घर के लोग संताप/विलाप की पराकाष्ठा पर हैं। जो कि काफी लंबा चलने वाली प्रक्रिया है। यह वोइड भर पाना उनके लिए मुश्किल है । शोक कुछ मामलों में निजी तौर पर एकांत में शांति से आती है। बीसियों, सैकड़ों, हज़ारों स्क्रीनशॉट्स की स्लाइड्स जो आदमी अपनी चित्रोपमता के हिसाब से महसूस करता है । खबर से दादा के आने से बीच का समय वो 48 घण्टे परिवार के लिए कल्प के समान थे जिसमें रायगढ़वासी/राष्ट्रीय पपराजी साथ थे उसके बाद से परिवार है। स्टेपवाइज़ रीथ लेयिंग सेरेमनीज़ घर के लिए कितनी दुखदायी है, पास से देखा अब वो तुम्हारा नही देश का है छन के पहुंचेगा। अपने को आखिरी बार देखने का इन्तजार शायद ही किसी केस में इतना लंबा सा होगा । बुलु दादा के नहीं होने का गम मेरा और सभी भाईयों का बराबर है। कहते हैं दुख की तुलना नहीं करनी चाहिए कि किसका कम, किसका ज्यादा? मैं दूसरों का दुख देख सकता हूं पर अपना नहीं। मुझे अपना दुख देखना है और वह विकल्प से मेरी दोस्ती का यह सबसे बड़ा साझा होगा। फुफाजी सुभाष त्रिपाठी का कहना कि अभी अपना रोना बचा है पर कब कैसे यह सोच कांप उठता हूँ। और बाकी भाइयों का कि बुलु दादा की विदाई ऐसे नहीं करेंगे। मैं, मनु दा और टिकू दा अभी कभी भी नोस्टाल्जिक हो जाते पर तुरंत एक दूसरे को बिजी कर लेते हैं। बुलु भैया, भाभी और उस छोटे से अबीर के नहीं होने की खबर आई और लोग आते रहे। भैया, भाभी और अबीर आये, इस बार कुछ अलग तरीके से। फिर लोग और भी आए। मीडिया घर तक आई। कल तक हम ख़बर लिखने वाले आज खुद ख़बर थे। सबने बहुत कुछ बोला, हमारे कांधों पर हाथ रखा। हम और खासकर मैं कुछ न कह पाया। मैं वहीं था बुलु दादा के परिवार समेत शहादत की ख़बर से अब तक... घर आते लोगों के बीच मैं अवाक था। मैं किससे बोलूं, क्या बोलूं, इस समय यह लिखते हुए भी सोच रहा हूं। एक पल को लगता है मैं सब बता सकता हूं और अगले ही क्षण मुझे संशय होता है कि शुरू कहां से करूं! क्या मैं इतना जड़ हो गया हूं कि अपने बुलु दादा का "हंसता हुआ नूरानी चेहरा" सामने ही दिखता है और वहीं कहीं उनकी तस्वीर पर माला दिखती है। बुबलु दादा कोशिश में कामयाब है सब संभाले हुए है। पिछली बार हम बैठे थे, तो वही तमाम बातें हुईं थीं जिनमें बुलु दादा ...हमारे भैया नहीं दोस्त होते। उन्हें बातों-गानों का बड़ा शौक था। श्याम लाल का बंगला भी मेरी तरह उन्हें खोज रहा होगा। भैया ने रायगढ़ की अपनी अंतिम सांझ वहीं बिताई थी, हमारे साथ। नहीं, वो हमारे साथ नहीं थे, उनके होने पर हम उनके साथ होते थे। हाई स्कूल के समय से उन्हें देख रहा था, रहे वे वही के वही। मुस्कुराना नहीं छोड़ते थे। मुस्कुराता हुआ कर्नल विप्लव त्रिपाठी साथ बैठता था हमारे और वो हमें वही 10वीं - 12वीं के देखे बुलु दादा जान पड़ते। भैया चुप से, हटके, दूर रहना पसंद नहीं करते थे। उन्हें इर्द - गिर्द अपने लोग चाहिए होते थे। हंसने ... हंसाने के लिए। अभी ये लिखते हुए मुझे लग रहा है कि इसे पढ़कर भी वे हंस पड़ेंगे! आपकी लिखावट और शब्दों के प्रयोग में हम कुछ भी नहीं फिर वह हिंदी हो या अंग्रेजी। " मैं क्या करूं बुलु दादा... मैं आपको लिख नहीं पा रहा, मैं अभी भी आपको देख सकता हूं वहीं श्याम लाल के बंगले में.... हम सारे दोस्त चंटी, टीकू, मनू, टाबू, अभिनव, रितेश, बबलू और बुबलु दादा भी, वहीं बैठे हैं आपके ठहाके सुनते हुए... कैसे मान लें आप उठकर चले गए और आए ही नहीं... हर बार की तरह इस बार भी तो कहा था आपने cheers till we meet again
अब हम लोग क्या करें सुभाष भैया ?
शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी के पिता श्री सुभाष त्रिपाठी को मैं अग्रज का दर्जा देता हूँ। त्रिपाठी परिवार से मेरे परिवार का पुराना प्रगाढ़ संबंध है। विप्लव के दादा स्वर्गीय श्री किशोरी मोहन त्रिपाठी संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य थे। जिस संविधान ने हमें उदार, समावेशी एवं सेकुलर बनाया, जिस संविधान ने हमें स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे व्यापक आदर्शों-मूल्यों का आदर करना सिखाया- स्वर्गीय किशोरी मोहन त्रिपाठी उस संविधान के निर्माण की प्रेरक और गहन प्रक्रिया के साक्षी-सहभागी थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी स्वर्गीय श्री त्रिपाठी की पत्रकारिता में गहरी रुचि थी। उन्होंने आज से 52 वर्ष पहले "बयार" नामक एक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया था जो स्वाभाविक रूप से मूल्य आधारित पत्रकारिता और गुणवत्तापूर्ण सामग्री संकलन के लिए विख्यात था। समय बीता। किशोरी मोहन त्रिपाठी जी के देहावसान के बाद अनेक संकटों, अनेक झंझावातों का सामना करते हुए अग्रज सुभाष त्रिपाठी ने "बयार" को रुकने नहीं दिया। इसी "बयार" की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में रायगढ़ में सन 2019 में आयोजित एक सादे किंतु सुरुचिपूर्ण कार्यक्रम के युवा और सुलझे हुए संचालक के रूप में कर्नल विप्लव त्रिपाठी से मेरी अंतिम मुलाकात हुई थी। बयार का कार्यालय पिछले पांच दशकों में हमारी पत्रकारिता में आए परिवर्तनों का साक्षी रहा है। सिद्धांतनिष्ठा की बड़ी कीमत बयार ने चुकाई है।बयार कार्यालय शहर के हृदय स्थल पर स्थित है। अब चारों ओर से धनकुबेरों की अट्टालिकाओं ने इसे घेर लिया है। यह अट्टालिकाएं और इनकी सोच बयार को परास्त और पराभूत करना चाहती है किंतु बयार पूरी दृढ़ता से डटा हुआ है। जीर्ण शीर्ण भवन में अग्रज सुभाष त्रिपाठी और उनके एक दो स्वैच्छिक सहयोगी अब दैनिक हो चुके बयार को उसके तेवर और गरिमा के साथ जिंदा रखे हुए हैं। हम जैसे कुछ बुद्धिजीवी भौतिक समृद्धि को सब कुछ समझने वाली बाहरी दुनिया के क्रूर शिकंजे से बचकर हमेशा यहां पनाह लिए रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे सुभाष भैया ने अपनी तपस्या से इस कार्यालय में काल को थाम लिया है, समय चक्र रुक गया है, पत्रकारिता की अधोगामी, पतनोन्मुख प्रवृत्तियां साहस और सैद्धांतिकता की लक्ष्मण रेखा को लांघ न पाने के कारण बाहर ठिठकी खड़ी हैं। सुभाष भैया की अर्द्धांगिनी आशा भाभी शासकीय महाविद्यालय में ग्रंथपाल रही हैं और सेवानिवृत्ति के बाद उनका नाता पुस्तकों से प्रगाढ़ ही हुआ है। वे स्त्री विमर्श पर नियमित रूप से लिखती हैं। समाजसेवा का व्यसन तो उन्हें है ही। त्रिपाठी दंपत्ति के गर्व और प्रसन्नता से आलोकित मुखमंडल को देखकर कोई भी यह सहज रूप से कह सकता था कि यह अपने आदर्शों के अनुरूप सत्यनिष्ठा से जीवन जीने के कारण पैदा हुई चमक है। त्रिपाठी दंपत्ति के गर्व का अतिरिक्त कारण यह भी रहा है कि उनके दोनों पुत्र थल सेना में हैं और देश के पूर्वोत्तर भाग की सीमाओं की रक्षा में सन्नद्ध हैं। त्रिपाठी दंपत्ति आयु की दृष्टि से लगभग सात दशक पूर्ण कर रहे हैं। यही वह समय होता है जब कठिन संघर्ष के बाद किसी मध्यम वर्गीय परिवार को एक ठहराव, एक सुकून और खुशियों के कुछ अनमोल पल मिलते हैं। आशा भाभी रिटायरमेंट के बाद सुभाष भैया को समय दे पा रही थीं। बेटे वेल सेटल्ड थे, प्यार और सम्मान देने वाली बहुओं और शरारती बच्चों से भरा पूरा आनंदित परिवार। कोविड-19 के कारण कर्नल विप्लव लंबे समय से अपने माता-पिता के पास गृह नगर रायगढ़ नहीं आ पाए थे सो उन्होंने अपने माता-पिता को ही अपने पास मणिपुर बुला लिया था। बेटों के साथ तीन महीने का आनंदपूर्ण समय बिताकर त्रिपाठी दंपत्ति दीपावली के बाद बस रायगढ़ आए ही थे कि उन पर वज्राघात हुआ- यह हृदयविदारक समाचार मिला कि कर्नल विप्लव और उनका पूरा परिवार चार अन्य साथी सैनिकों के साथ मणिपुर में हुए आतंकी हमले में शहीद हो गया। मुझे सुभाष भैया का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार करने में एक दिन का समय लगा। अंततः मैं उनके पास गया, हम खूब रोये,कौन किसको ढाढस बंधाता, हाल हम दोनों का एक जैसा था। मैं छोटा हूँ, मैंने पूछा-अब हम लोग क्या करें भैया। उनका उत्तर था- मुझे भी पता नहीं है राजू। सब अंधेरा हो गया। शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी की अंतिम यात्रा रायगढ़ नगर के लिए एक इतिहास बन गई, पूरा नगर उन्हें श्रद्धांजलि देने उमड़ पड़ा। त्रिपाठी दंपत्ति को सांत्वना देने के लिए शीर्षस्थ राजनीतिक नेताओं का आना जारी है। जबसे इस देश में सैनिकों की शहादत और उनके सम्मान को चुनावी दंगल का मुख्य मुद्दा बनाया गया है तबसे कोई राजनीतिक दल किसी भी प्रकार की चूक नहीं करना चाहता। निश्चित ही इन राजनेताओं के मन में अमर शहीद विप्लव के प्रति गहरी श्रद्धा एवं शोकाकुल परिवार के प्रति गहरी संवेदना होगी किंतु अब जब इस श्रद्धा-संवेदना की अभिव्यक्ति के राजनीतिक मायने निकालने की परिपाटी चल निकली है तो स्वाभाविक रूप से इसका रणनीतिक महत्व भी बनता है। अपने अपने आराध्य नेताओं के सम्मुख पाइंट स्कोर करने की हड़बड़ी में युवा बाइकर्स कभी कभी यह भूलते दिखे कि यह कोई उत्सव नहीं है युवा शहीद की अंतिम विदाई का अवसर है। जिस प्रदर्शनप्रियता और शोरगुल से दूर बयार कार्यालय की एकांत साधनास्थली है उसी दिखावे और आडम्बर की गूंज डीजे पर बजते फिल्मी देशभक्ति के गीतों में सुनाई दी। हर कोई शहीद विप्लव के प्रति अलंकारिक शब्दों में अपने उद्गार व्यक्त कर रहा है। शायद इसमें बहुत से मुझ जैसे लोग भी हैं जो अपने नागरिक कर्त्तव्यों का पालन नहीं करते, अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचार को मौन सहमति देकर देश को कमजोर बनाते हैं तथा जानते हुए भी कि यह हमारे लिए विनाशकारी सिद्ध होगा धर्मांधता एवं हिंसा के उभार से आनंदित होते हैं। हम अपनी सड़कों और गलियों में शहीद विप्लव के पोस्टर लगाकर शायद अपनी ग्लानि को कम कर रहे हैं या खुद को, देश को और विप्लव को भी धोखा दे रहे हैं। विप्लव ने देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा का प्रण लिया था। उसे भरोसा था कि हम देश की राजनीतिक शुचिता, सामाजिक समरसता और साम्प्रदायिक एकता की पवित्र सीमा के उल्लंघन का प्रयास करने वाले हर शत्रु को पराजित करेंगे। हमने उसका भरोसा तोड़ा है। मेरे छोटे से शहर में बड़े बड़े टीवी चैनलों के नामचीन रिपोर्टर्स का आगमन कम ही होता है किंतु इस बार हुआ। त्रिपाठी दंपत्ति के लिए यूं अचानक बेटे को खोना किसी तेज हथियार से अचानक लगे घाव की तरह है जिसका दर्द तुरंत नहीं होता- धीरे धीरे इसकी गहरी वेदना आक्रमण करती है। लेकिन हर चैनल का अपना एजेंडा है और ऐसे निर्मम सवाल हैं जो पीड़ित परिवार को उस त्रासदी का विश्लेषण करने के लिए बाध्य कर रहे हैं जो अभी शुरू ही हुई है। शोक प्रदर्शन की विषय वस्तु नहीं है। इवेंट मैनेजमेंट के फंडे शोक विषयक आयोजनों के लिए नहीं बने हैं। मौन,एकांत और नीरवता शोक की पवित्रता की रक्षा के साधन हैं। मैं सुभाष भैया को अच्छी तरह जानता हूँ, उनकी गहरी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म निरीक्षण क्षमता का मैं प्रशंसक हूँ। मुझे लगता है इस सारे घटनाक्रम से वे हतप्रभ होने की सीमा तक चकित हुए होंगे। संवेदना प्रदर्शन का यह असंवेदनशील सा सिलसिला कुछ दिन बाद खत्म हो जाएगा। सर्दी की लंबी ठिठुराने वाली रातों में वृद्ध त्रिपाठी दंपत्ति को जीने की ऊष्मा देने के लिए जिंदादिल और गर्मजोश विप्लव की याद भर रह जाएगी। साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार भारत में 6 मार्च 2000 से 20 नवंबर 2021 तक आतंकवाद से जुड़ी हिंसक घटनाओं में 14050 नागरिक, 7363 सुरक्षा बलों के सदस्य,23342 आतंकवादी/अतिवादी एवं 1195 अज्ञात लोगों समेत कुल 45950 लोग मारे गए हैं। हमारे लिए यह एक संख्या हो सकती है जिसकी घट-बढ़ पर हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं लेकिन इन हजारों परिवारों की त्रासदी को समझने के लिए हमें वृद्ध त्रिपाठी दंपत्ति के उदास चेहरे को बांचना होगा जिनका सब कुछ खत्म हो गया है। आतंकवाद की उत्पत्ति और उसके पनपने के कुछ खास कारण होते हैं यथा - स्थानीय निवासियों का शोषण एवं उपेक्षा,मूल निवासी बनाम बाहरी का विवाद, भाषा, धर्म और संस्कृति के अनसुलझे सवाल, जल-जंगल-जमीन से बेदखल होने की पीड़ा, क्षेत्रीय पार्टियों और उनके कद्दावर नेताओं की अतृप्त महत्वाकांक्षाएं, आपराधिक तत्वों द्वारा अन्य देशों से व अन्य देशों को की जाने वाली स्मगलिंग एवं ह्यूमन ट्रेफिकिंग, अवैध वसूली गिरोहों के आर्थिक हित, सीमावर्ती प्रदेशों में दूसरे देशों द्वारा स्थानीय आतंकवादियों को दिया जाने वाला सहयोग और विदेशी आतंकियों की घुसपैठ के प्रयास आदि। लेकिन आतंकवाद को नासूर में बदलने के लिए असल जिम्मेदार राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी होती है। जब राजनीतिक प्रक्रिया विफल हो जाती है, संवाद का सेतु टूट जाता है, अविश्वास गहराने लगता है तब हिंसा का प्रवेश होता है। राजनीतिक नेतृत्व की असफलता की भरपाई का जिम्मा सुरक्षा बलों को दिया जाता है। प्रायः आतंकी स्थानीय होने के कारण स्थानीय परिस्थितियों से परिचित होते हैं और स्थानीय समुदाय भी भय या सहानुभूति के कारण उनका सहयोग करता है, इन आतंकवादियों द्वारा तैयार किए गए चक्रव्यूह को भेदने के लिए सुरक्षा बलों को अपनी जान दांव पर लगानी पड़ती है। हिंसा की अपनी भाषा होती है, अपना व्याकरण होता है। जब सामने से गोलियां चल रही होती हैं तो उसका उत्तर गोलियों से देना ही पड़ता है। लेकिन हिंसा के बाद की मानवीय त्रासदी पर हमारा ध्यान नहीं जाता। अनंत संभावनाओं और सकारात्मक ऊर्जा से लबरेज़ विप्लव का सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी था। लेकिन हिंसा ने सब समाप्त कर दिया। त्रिपाठी दंपत्ति और उन जैसे हजारों हिंसा पीड़ित परिजनों की आंखों में लहराते शोक और पीड़ा के महासागर की लहरें अनंत काल तक अशांत सी उठती गिरती रहेंगी, जब जब हिंसा किसी मानव जीवन का अंत करेगी, इन लहरों की छटपटाहट और बढ़ जाएगी।
रोटी बैंक : किसी आयोजन का बचा है खाना तो बांटे जरूरतमंदो में
जरूरतमंदों को भोजन मुहैया कराता कार्डिनल रोटी बैंक
चक्रधर समारोह : 5 लाख का बजट और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग
प्रशासन ने शुरू की तैयारी, कलाकारों के रिकॉर्डिंग आना शुरू
एमसीएच : कोरोना मरीजों को दे रहा जीवनदान
ठीक हुए मरीज पत्र लिखकर जता रहे एमसीएच का आभार, पत्र हुए वायरल
महामारी में बिजली के अलावा ज़िंदगियों को रोशन करता एनटीपीसी लारा
कोविड अनुरूप व्यवहार को आत्मसात कर हमने जनहानि नहीं होने दी : आलोक गुप्ता, सीजीएम
बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़ संक्रमण रोकने में जुटी माताएँ
मदर्स डे विशेष : समाज के लिए कलेजे के टुकड़ों से महीने दूर, पर बढ़ता गया प्यार
भाऊ रंगकर्म और विचारधारा
रंगकर्मी अजय आठले की पहली पुण्यतिथि पर वैचारिक स्मरण
बस अब मौत की आखिरी हिचकी आने वाली है केआईटी को
2004 में मैं पहली बार किरोड़ीमल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के नए बिल्डिंग को देखने गया, जो दो साल पहले यहां शिफ्ट हुई थी। बारहवीं का पेपर देने के बाद ख्वाब आईआईटी के थे लेकिन केआईटी को यूं ही देखने का मन किया,कई सारे मित्र यहीं थे, सो आ गया। किस्मत भी सपने तोड़कर मुझे 2006 में यहीं लाकर पटक दी। ये दौर केआईटी का स्वार्णिम दौर था, 4 ब्रांच और 900 से अधिक बच्चे इस 15 एकड़ के कैंपस में यत्र-तत्र-सर्वत्र दीख जाते। उस समय अभी वाली चकाचक नई बिल्डिंग की किसी ने कल्पना नहीं की थी जो आज शो-पीस बनकर रह गई है। बात कैंपस की करें तो सीनियर-जूनियर बड़े अदब से रहते, कुछ जिले के आदिसावी ग्राम से निकलकर आए तो कुछ पड़ोसी राज्यों से। इंजीनियरिंग कॉलेज अपने पूरे शबाब पर था। केआईटी शुरू से ही लार्जर दैन लाइफ रहा क्योंकि बाहर से आए बच्चों के पास तब भी हॉस्टल नहीं था और जो बनना शुरू हुआ वो आज अधूरा है और खंडहर है, करोड़ो रूपये का बंदरबाट इस निर्जन के नाम पर हो चुका। लैब अपना रूप ले ही रहे थे कि गिद्धों की नजर पड़ी। केआईटी शासन द्वारा प्रवर्तित स्ववित्तपोषित संस्था है, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि 15 साल बाद केआईटी का पतन शुरू हो जाएगा जबकि उसके पास आज एक 15 करोड़ से अधिक की बहुमंजिला इमारत है हालांकि इसकी जरूरत कभी थी ही नहीं उसे, पर गिद्धों को जो अपना घर भरना था। हर जगह लूट-खसोट होती गई। आर्थिक अनियमितता के जांच-क्लीनचिट-दोष-आरोप जारी हुए और चल रहा है। एक गिद्ध ने तो अपने ही कार्यकाल में हुए घोटालों को छिपाने के लिए और लोगों का मुंह बंद करने के लिए दो दर्जन आरटीआई लगा दिया है। खैर प्रशासनिक जांच में इसका रहस्योद्घाटन होगा, फिलहाल यह विषयांतर होगा। qqq साल 2012 के बाद छात्रों का इंजीनियरिंग से मोह भंग होना शुरू हो गया था जिसकी माया केआईटी में भी आई। जिस समय केआईटी को मजबूत करना था जिम्मेदारों ने खुद को मजबूत किया, आत्मनिर्भर बन गए, घोटाले-दर-घोटाले होते रहे। आदिवासी क्षेत्र का सबसे पहला कॉलेज सबसे मंहगा कॉलेज भी एक समय बन गया। एक तो मोहभंग और दूसरा फीस का बढ़ना केआईटी को गर्त में ले गया। स्व-वित्तपोषित संस्था के पास पैसे खत्म होने लगे। फिर डीएमएफ फंड से 6 महीने का स्टाफ खर्चा मिला लेकिन जब पैसा है ही नहीं तो कॉलेज कैसे चलेगा। अभी 13 महीने से यहां स्टाफ को तनख्वाह नहीं मिली है। बच्चों की तादाद 150 के आसपास है तब जब दो नए ब्रांच खुले। qqq भावी/भूतपूर्व इंजीनियर अपना विषय भले ही न जानते हों पर बोर्ड ऑफ गवर्नर (बीओजी) जरूर जानते हैं जो सारे फैसले लेती है ऐसे फैसले जो कभी समय पर नहीं हुए और जिनका कोई अर्थ नहीं। अभी तक बीओजी का मुखिया दूसरे जिले का होता था पर इस बार तो अपने जिले का है जिसने केआईटी को डूबने नहीं देने का वायदा भी किया, खुद मुझसे उन्होंने कहा कि मैं केआईटी को बंद नहीं होने दूंगा। मैंने मुख्यमंत्री से भी पूछा तो उन्होंने आश्वासन दिया। केआईटी के लिए एक नई तरकीब निकल कर आई कि यहां अन्य कोर्सेस खोले जाएं और केआईटी फिर से आत्मनिर्भर बनेगा। रायपुर से फतवा आया कि बीफार्मा खोला जाए। अब टेक्निकल कॉलेज और बीफार्मा में बदलेगा तो पुराने स्टाफ का क्या। वैसे भी फार्मा में जिले में बहुत शक्ति लगी है। कल शाम को बीओजी की एक और बैठक हुई मुखिया बोले केआईटी शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज बनेगा, पैसा डीएमएफ से पास हो गया है जल्द ही मिल जाएगा। केआईटी को शासकीय कॉलेज बनने का सब्ज बाग देखते-देखते दो दशक और हजारों छात्र निकल गए। केआईटी की नई बिल्डिंग आज एक विश्वविद्यालय है और एकदम नया चकाचक वाला कोविड केयर क्योंकि छात्र तो घर पर ही हैं। अगर केआईटी का समय रहते कुछ नहीं किया तो बस मौत की आखिरी हिचकी उसे आने ही वाली है।
परंपरा, आधुनिकता और स्त्री का अंर्तद्वंद्व
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के स्त्री के परिधान को लेकर एक बयान पर काफी बवाल मचा हुआ है खासकर फटी जींस पहनी एक एनजीओ चलाने वाली स्त्री पर उनकी टिप्पणी। उन्होंने तो फटी जींस ही कहा है, मेरे व्यक्तिगत विचार से तो चीथड़ों में लिपटी हुई आधुनिकाएं ज्यादा उपयुक्त शब्द है। हालिया खबर यह है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने अपने बयान पर माफी मांग ली है और कहा है किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना उनका मकसद कतई नहीं था। चलिए किस्सा खत्म हुआ क्योंकि यही उनका उद्देश्य था जो पूरा हो गया, सवाल यह है कि हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने वाली और स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित बयानबाजी करने वाली स्त्रियां मुझे स्त्री विमर्श पर संवेदित होने वाली महिलाएं कभी नहीं लगती। जया बच्चन जी का ही उदाहरण लें तो उन्हीं के पार्टी प्रमुख ने कभी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर कहा था कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। ऐसे बेशर्म वक्तव्य पर जया जी की मुखरता कहां लुप्त हो गई थी। हमारे अपने प्रदेश की महिला आयोग की अध्यक्षा का यह कहना कि उत्तराखंड के सीएम का बयान एक घटिया और कुंठित बयान है अध्यक्षा ने तो स्त्री के घुटनों पर फटी जींस और पुरुषों के घुटनों तक पैंट की आपसी तुलना तक कर डाली, बेहद हास्यास्पद और असंगत लगी यह तुलना जो उनके मानसिक प्रदूषण को दर्शाती है। खुद उनके अपने प्रदेश में स्त्री का क्या स्थिति है यह बेहतर जानती हैं। स्त्री हमारे समाज में हमेशा से पूज्यनीय रही और रहेगी। यह और बात है कि चंद दकियानूस लोग उसके चरित्र का आकलन पहनावे या ओढ़ावे से करते हैं। पहनने की आजादी अगर स्त्री को है तो उस पर टीका टिप्पणी भी अभिव्यक्ति की आजादी के अंदर ही आएगी। यदि मुख्यमंत्री जी ने ऐसी टिप्पणी की भी तो वह हिंदू संस्कृति और उसके सांस्कृतिक परिवेश को लेकर की होगी जिस पर तमाम स्त्री वर्ग से प्रतिक्रियाएं उठनी शुरू हो गईं। ऐसी 90 फीसदी महिलाएं खुद अपने परिवार में परंपरागत परिधानों को त्याग कर फटी जींस (चीथड़ों) पहनकर विवाह मंडप में बैठेगी या विवाह संपन्न करेगी उस दिन यह स्त्री स्वातंत्र्य का नायब नमूना पेश करेगी लेकिन नहीं शायद ऐसा कभी ऐसा संभव ही नहीं हो पाएगा क्योंकि फैशन के तौर पर ऐसे चीथड़े पहनने वाली स्त्रियां आधुनिकता का प्रतीक मानती हैं लेकिन मानसिक तौर पर वह कतई आधुनिक नहीं होती। चंद अंगुलियों पर गिनती की जाने वाली युवतियों को छोड़ दें तो तमाम स्त्रियों के भीतर एक ऐसी स्त्री हमेशा से मौजूद होती है जो अपनी परंपराओं की मर्यादा को जानती है उसके सौंदर्य पक्ष को ताकतवर होकर अनुशाषित ढंग से संवारती भी है उसे पता है कि फटी जींस पहनकर जीवन के लंबे कालखंड की पारी नहीं खेली जा सकती। अंत में एक सवाल : क्या ऐसे मंहगे चीथड़े पहनकर अपना वैभव प्रदर्शन करना उन गरीबों के साथ एक भोंडा मजाक नहीं है जिनके नसीब में ही चीथड़े पहनना लिखा है। (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
महज देह नहीं है स्त्री
लंबाई×चौड़ाई=क्षेत्रफल, यह स्कूली शिक्षा में पता चला। लंबाई×चौड़ाई=क्षेत्रफल, महाविद्यालयीन शिक्षा में एक कदम बढ़कर यह ज्ञान मिला कि किसी देश का भौगोलिक क्षेत्रफल जितना बड़ा होगा उसकी प्रभुता और शक्ति उतनी ही बड़ी होगी। यह सब किताबी ज्ञान है और असल जिंदगी किताबी ज्ञान से बिल्कुल अलग होती है। जिंदगी की किताब का पहला पन्ना पटलते ही पता लगा कि लंबाई और चौड़ाई का क्षेत्रफल स्त्री देह भी होती है। यह भी जाना कि स्त्री का भूगोल महज उसकी देह होती है और उसकी परिधि ही उसका प्रथम परिचय है, उसका यह भूगोल ही उसके भूत-वर्तमान और भविष्य का इतिहास है। यह नहीं जाना कि इस स्त्री देह में जो रक्त बहता है, जो आत्मा स्पंदित होती हैं या जो कामनाएं पनपती हैं वह पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं ईश्वर ने स्त्री और पुरुष की संरचना में फर्क जरूर किया है और यह फर्क स्त्री की बेहतरी के लिए किया। उसे सृजनात्मक शक्ति दी तो साथ में सेवा, सुश्रुषा और वात्सल्य जैसे गुण दिए जिन गुणों को पुरुषों को सीखना पड़ता है वह स्त्री के नैसर्गिक गुण होते हैं और उसके इसी नैर्सिगक गुणों का बेजा इस्तेमाल समाज ने या और स्पष्ट कहें तो पुरुष किया जो वर्तमान में भी जारी है। अखबारों में आज जब हम पढ़ते हैं कि एक ऑटोचालक की बेटी मिस इंडिया बनी या अमिताभ बच्चन के गेम शो में अलग-अलग वर्गों से आईं चार स्त्रियां करोड़पति बनी या फिर पहली बार हमारे देश की युवतियां फाइटर प्लेन उड़ाएंगी तो बड़े गर्व की अनूभूति होती है। जिसे हम महिला सशक्तिकरण की दिशा में हो रहे सार्थक प्रयास मानते हैं। पर रूकिये जरा हम अपने देश के इतिहास को खंगाले तो पाएंगे आज से 75 या 80 वर्ष पूर्व भी हमारे देश की नारियां ऐसे कार्य कर चुकी हैं। चाहे वह आजाद हिंद फौज के स्त्रियों की टुकड़ी हो जो छापामार युद्ध से लेकर जासूसी में निषनात थीं, स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय रही थी या शिक्षा की अलख जगाती रहीं। समर्थवान होने पर सामाजिक कार्य तक संपन्न किए हैं और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध भी संचालित किए हैं। फिर यह अचानक क्या हुआ हमें फिर से महिला सशक्तिकरण की जरूरत महसूस होने लगी। दरअसल जब से हमारी संस्कृति पर बाजारवाद हावी हुआ तब से बाजार की ताकतों ने समाज को अपनी उंगलियों पर कठपुलियों की तरह नचाने पर मजबूर कर दिया जिसकी शिकार स्त्रियां ही अधिक हुईं और पुरुष उसके माध्यम बन गए। आधुनिकता के नाम पर बाजार ने स्त्री को ढाल बनाकर जो फूहड़ता परोसी उसे स्त्री आजतक नहीं समझ पाई। भाषा, कपड़े, साहित्य, मनोरंजन आदि सभी क्षेत्रों में नकली आधुनिकता का ताना-बाना बुना गया उसने स्त्री के सोचन-समझने की क्षमता का अपहरण कर लिया ऐसी आधुनिकाएं जब स्वतंत्रता का झंडा लेकर उच्श्रृंखलता का प्रदर्शन करती हैं तो यह छद्म नारीवाद है। महज अपनी भाषणों में स्त्री स्वतंत्रा के नारे लगाने वाली ये सूडो फेमिनिस्ट महिलाएं पर जब बात जमीन पर उतरने की आती है तब उन्हें भी पुरुषों के बैसाखी की जरूरत होती है। यहां उल्लेख करना चाहूंगी हिंदी के प्रख्यात लेखक गजानंद माधव मुक्तिबोध से किसी ने पूछा था कि यह दुनिया क्यों टिकी है तब उनका जवाब था दुनिया स्त्री-पुरुषों के संबंधों के कारण टिकी है, जिस दिन स्त्री-पुरुष संबंध समाप्त हो जाएंगे, दुनिया खत्म हो जाएगी। यहां मुक्तिबोध का आशय जिस संबंध से वह महज दैहिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक-आध्यात्मिक संबंधों से है जो देह से बहुत ऊपर है। इसे वर्तमान में स्त्री से ज्यादा पुरुषों को समझने की जरुरत है और जिस दिन यह बात उन दोनों के समझ में आ जाएगी, दुनिया फिर खूबसूरत हो जाएगी। स्त्री के साथ होने वाली हिंसा स्वंय कम हो जाएंगे। स्त्रियां यह बात समझ चुकी हैं बस पुरुष का अहंकार इसे समझ नहीं पा रहा है। (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
कलेक्टर भीम सिंह ने भारी बारिश के बीच संभाला मोर्चा, देखें तस्वीरें
निगम अमला बीती रात से आयुक्त के साथ पूरे शहर में डटा हुआ है
तस्वीरों में देखें रायगढ़ में जनता कर्फ्यू का असर
22 मार्च यानी रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर जिले में भी जनता कर्फ्यू का असर देखने को मिला। दोपहर तक पूरा शहर स्वस्फूर्त बंद था। हर मुख्य मार्ग और बाजार बंद मिले। गली-कूचे तक कोई व्यक्ति बाहर नहीं निकला।
हरि बोल, जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ निकली रथयात्रा, देखें गैलरी
रायगढ़ में दो दिनों की रथयात्रा आयोजित होती रही है। इसी क्रम में आज रथ द्वितिया के दिन शहर के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर से भगवान श्री को विधिविधान पूर्वक पूजा अर्चना पश्चात मंदिर के गर्भगृह तथा मंदिर परिसर से जय जगन्नाथ के जयघोष और घंट शंख ध्वनि के बीच ससम्मान बाहर निकाला गया। राजापारा स्थित प्रांगढ़ में मेले सा माहौल था और हजारो की संख्या में श्रद्धालु भक्तगण भगवान श्री के दर्शन करने के लिए पहुंचे हुए थे। इससे पहले कल भगवान जगन्नाथ की विधि विधान से पूजा की गई जिसे फोटोग्राफर वेदव्यास गुप्ता ने अपने कैमरे में कैद किया।
इप्टा रायगढ़ के 25वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की झलकियां
27 से 31 जनवरी तक पॉलिटेक्निक ऑडिटोरिम में इप्टा रायगढ़ द्वारा 25वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। जिसमें चार नाटक एवं दो फीचर फिल्में दिखाई गईं। समारोह की शुरुआत रायपुर के मशहूर रंगकर्मी मिर्जा मसूद को 10वां शरदचंद्र वैरागकर अवार्ड देकर की गई। यह कूवत सिर्फ रंगमंच रखता है जो वर्तमान सत्ता के मठाधीशों पर अजब मदारी गजब तमाशा नाटक के माध्यम से सीधे कटाक्ष कर सकता है। जहां एक मदारी को राजा बना दिया जाता है, शब्दों के अस्तित्व को खत्म कर दिया जाता है। बंदर राष्ट्रीय पशु बन जाता है। गांधी चौक नाटक में गांधीजी की प्रतिमा स्वयं यह चलकर वहां से हट जाती है कि जब रक्षक की भक्षक बन गए तो कोई क्या कर सकता है। नोटबंदी और जीएसटी पर गांव वाले सीधे प्रहार करते हैं। सुबह होने वाली है की लेखी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध होने के बाद लोगों को जागरूक करने को किताब लिखती और किताब को ही फांसी हो जाती है। बोल की लब आजाद हैं तेरे लोगों को दर्शकदीर्घा में झकघोर के रख देती है। तुरूप और भूलन जैसी फिल्में लोगों के मनोरंजन के अलावा दमदार संदेश भी देती है। तो देखें इस शानदार नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की कुछ झलकियां
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