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Saturday, July 31, 2021
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लोकशक्ति : मिलकर कर रहा पूरे रायगढ़ का जतन
कोरोना संक्रमण रोकथाम से लेकर वैक्सीनेशन तक में गांव स्तर पर निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
हमारे बच्चे
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विधायक ही नहीं चाहते छत्तीसगढ़ में शराबबंदी:भाजपा
राजनीति
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केआईटी पर शुरू हुआ घमासान, ओपी पर अब अनिल चीकू ने साधा निशाना
राजनीति
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केआईटी को सरकार अधिग्रहित करे : ओपी चौधरी
राजनीति
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1 से 7 अगस्त तक रायगढ़ में मनाया जाएगा विश्व स्तनपान सप्ताह
हमारे बच्चे
एसपी मीणा की बीटवाइज पुलिसिंग पर जोर
धीरे-धीरे रिफाइन कर रहे बीट सिस्टम को : एसपी अभिषेक मीणा
52 दिन बाद रायगढ़ हुआ अनलॉक, रविवार रहेगा लॉक
कंटेनमेट अवधि में अनुमति प्राप्त गतिविधियों का होगा शर्तो के साथ संचालन प्रतिदिन संध्या 5 बजे से से प्रात: 6 बजे तक रात्रिकालीन लॉकडाउन
सरकारी अस्पतालों में अब निशुल्क लगेगा निमोनिया का टीका
टीके की 2,200 खेप उपलब्ध, सारी तैयारियां पूरी
लॉकडाउन में मजदूरों की समस्या से रूबरू हो रहे इंटक अध्यक्ष शाहनवाज
कहा- संक्रमण से बचने वैक्सीन अवश्य लगवाएं
विधायक ही नहीं चाहते छत्तीसगढ़ में शराबबंदी:भाजपा
विधायक शिवरतन शर्मा 1 जनवरी 2022 से शराबबंदी का लाए थे रिजॉल्यूशन, केवल 13 विधायकों का मिला समर्थन, इसलिए खारिज
केआईटी पर शुरू हुआ घमासान, ओपी पर अब अनिल चीकू ने साधा निशाना
ओपी ने केआईटी के लिये बहाए मगरमच्छ के आंसू-अनिल चिकू
केआईटी को सरकार अधिग्रहित करे : ओपी चौधरी
चंदूलाल चंद्राकर मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के बजाए केआईटी को सरकारी बनाने ओपी ने लिखा उमेश को खत
सुनील लेंध्रा के खिलाफ दुष्कर्म का आरोप, अब मामला दाखिल दफ्तर भी हो सकता है
मामले की केस डायरी हाईकोर्ट ने की तलब
मानसून एक्टिव होने की संभावना
मानसून 10 जुलाई के आसपास पुनः सक्रिय होने वाला था किंतु मानसून के साथ अनसरटेनिटी जुड़ी होती है इसलिए सारे अनुमानों को धरा करते हुए पिछले 10 दिन लोगों के लिए गर्मी उमस से बेहाल करने वाले थे, इस दौरान वायरल के विक्टिम्स काफी दिखाई दिए । अब फाइनली मौसम विज्ञान विभाग ने अच्छी बारिश की संभावना जताई है । मौसम विज्ञान विभाग रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर एच पी चन्द्रा के अनुसार मानसून द्रोणिका के पश्चिमी भाग बीकानेर, रोहतक और सुल्तानपुर होते हुए 0.9 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है जबकि पूर्वी भाग हिमालय की तराई में स्थित है। (पूर्वी भाग के हिमालय की तराई में चले जाना ही मध्य भारत के लिए मानसून ब्रेक कहलाता है, इसके कारण एक दो स्थानों पर हल्की वर्षा ही होता है) एक चक्रीय चक्रवाती घेरा दक्षिण तटीय आंध्र प्रदेश और उसके आसपास 1.5 किलोमीटर से 4.5 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है। प्रदेश में कल दिनांक 19 जुलाई को आने की स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा होने अथवा गरज चमक के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। प्रदेश में एक-दो स्थानों में गरज चमक के साथ वज्रपात होने की भी संभावना है। प्रदेश में अधिकतम तापमान में विशेष परिवर्तन होने की संभावना नहीं है। कल के बाद अधिकतम तापमान में 20 जुलाई तक गिरावट होने की संभावना है। 20 जुलाई से प्रदेश के अधिकांश स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा होने अथवा गरज चमक के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। 20 जुलाई और उसके बाद प्रदेश के एक-दो स्थानों पर गरज चमक के साथ वज्रपात होने तथा भारी वर्षा होने की भी संभावना है। 31 फीसदी कम बरसा पानी मौसम विज्ञान विभाग द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार रायगढ़ जिले में मानसून सीजन में बीते कल तक 443.7 मिमी औसत के मुकाबले 306.4 मिमी बारिश ही दर्ज की गई है जो 31 फीसदी कम है खरीफ किसान चिंतित हैं , बेसिन सिंचाई वाली धान की फसल के लिए अभी तत्काल बारिश जरूरी है । आने वाले कुछ दिनों में रायगढ़ में तापमान के थोड़ा कम होने एवं अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान लगभग 32 एवं 23 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है।
मानसून रिवाइवल : आगामी 48 घंटों के लिए ऑरेंज अलर्ट
बीते कई दिनों से हो रही उमस से जिले को राहत मिलने की उम्मीद है। मौसम विभाग ने आगामी 48 घंटों में अच्छी बारिश होने की संभावना जताई है। रायगढ़ जिले के लिए ऑरेंज अलर्ट भी जारी किया है। मौसम विज्ञान विभाग रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर एच पी चंद्रा के अनुसार एक चक्रीय चक्रवाती घेरा उत्तर पश्चिम बंगाल की खाड़ी और उससे लगे तटीय उड़ीसा और तटीय पश्चिम बंगाल के ऊपर 4.5 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है। एक द्रोणीका पंजाब से उत्तर पूर्व बंगाल की खाड़ी तक हरियाणा, दक्षिण उत्तर प्रदेश, दक्षिण पश्चिम बिहार, झारखंड और गंगेटिक पश्चिम बंगाल होते हुए माध्य समुद्र तल पर स्थित है। एक चक्रीय चक्रवाती घेरा उत्तर-पूर्व उत्तर प्रदेश के ऊपर 1.5 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है। एक द्रोणिका उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी और उससे लगे तटीय उड़ीसा और पश्चिम बंगाल से दक्षिण तटीय आंध्र प्रदेश तक 3.1 किलोमीटर ऊंचाई तक स्थित है। कल दिनांक 9 जुलाई को प्रदेश के अधिकांश स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा होने अथवा गरज चमक के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। प्रदेश में गरज चमक के साथ कुछ स्थानों पर भारी वर्षा होने, एक-दो स्थानों पर अति भारी वर्षा होने तथा वज्रपात होने की संभावना है। प्रदेश में अधिकतम तापमान में मामूली गिरावट संभावित है। भारी वर्षा का क्षेत्र मुख्यतः मध्य और दक्षिण छत्तीसगढ़ रहने की संभावना है।
गरज चमक के साथ मॉनसून पहुचा रायगढ़
शनिवार रायगढ़ शहर में 22.2 मिमी बारिश दर्ज की गई ।
मानसून पहुंचा छत्तीसगढ़ रायगढ़ भी जल्दी पहुचेगा मॉनसून
आने वाले तीन दिनों में भारी बारिश की चेतावनी
लोकशक्ति : मिलकर कर रहा पूरे रायगढ़ का जतन
कोरोना संक्रमण रोकथाम से लेकर वैक्सीनेशन तक में गांव स्तर पर निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
1 से 7 अगस्त तक रायगढ़ में मनाया जाएगा विश्व स्तनपान सप्ताह
मदर्स एबसेल्यूट एफेक्शन “मां” कार्यक्रम को बढ़ावा देने पर जोर
शत प्रतिशत टीके के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा रायगढ़, महाभियान 30 को
टीके को लेकर लोग परेशान न हों : जिला टीकाकरण अधिकारी
डेंगू मुक्त रायगढ़ बनाने के लिए अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधि भी आगे आए
घर के गमले टायर कूलर के जमा पानी को जरूर साफ करें : सीपीएम डॉ. राकेश वर्मा
एमसीएच : कोरोना मरीजों को दे रहा जीवनदान
ठीक हुए मरीज पत्र लिखकर जता रहे एमसीएच का आभार, पत्र हुए वायरल
महामारी में बिजली के अलावा ज़िंदगियों को रोशन करता एनटीपीसी लारा
कोविड अनुरूप व्यवहार को आत्मसात कर हमने जनहानि नहीं होने दी : आलोक गुप्ता, सीजीएम
बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़ संक्रमण रोकने में जुटी माताएँ
मदर्स डे विशेष : समाज के लिए कलेजे के टुकड़ों से महीने दूर, पर बढ़ता गया प्यार
डॉ. रूपेंद्र पटेल और ताराचंद्र पटेल ने डब्ल्यूएचओ की थीम को किया चरितार्थ
विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष : 8 माह की गर्भवती और दो बार कोविड पॉजिटिव डीपीएम सभी के लिए सीख
बस अब मौत की आखिरी हिचकी आने वाली है केआईटी को
2004 में मैं पहली बार किरोड़ीमल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के नए बिल्डिंग को देखने गया, जो दो साल पहले यहां शिफ्ट हुई थी। बारहवीं का पेपर देने के बाद ख्वाब आईआईटी के थे लेकिन केआईटी को यूं ही देखने का मन किया,कई सारे मित्र यहीं थे, सो आ गया। किस्मत भी सपने तोड़कर मुझे 2006 में यहीं लाकर पटक दी। ये दौर केआईटी का स्वार्णिम दौर था, 4 ब्रांच और 900 से अधिक बच्चे इस 15 एकड़ के कैंपस में यत्र-तत्र-सर्वत्र दीख जाते। उस समय अभी वाली चकाचक नई बिल्डिंग की किसी ने कल्पना नहीं की थी जो आज शो-पीस बनकर रह गई है। बात कैंपस की करें तो सीनियर-जूनियर बड़े अदब से रहते, कुछ जिले के आदिसावी ग्राम से निकलकर आए तो कुछ पड़ोसी राज्यों से। इंजीनियरिंग कॉलेज अपने पूरे शबाब पर था। केआईटी शुरू से ही लार्जर दैन लाइफ रहा क्योंकि बाहर से आए बच्चों के पास तब भी हॉस्टल नहीं था और जो बनना शुरू हुआ वो आज अधूरा है और खंडहर है, करोड़ो रूपये का बंदरबाट इस निर्जन के नाम पर हो चुका। लैब अपना रूप ले ही रहे थे कि गिद्धों की नजर पड़ी। केआईटी शासन द्वारा प्रवर्तित स्ववित्तपोषित संस्था है, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि 15 साल बाद केआईटी का पतन शुरू हो जाएगा जबकि उसके पास आज एक 15 करोड़ से अधिक की बहुमंजिला इमारत है हालांकि इसकी जरूरत कभी थी ही नहीं उसे, पर गिद्धों को जो अपना घर भरना था। हर जगह लूट-खसोट होती गई। आर्थिक अनियमितता के जांच-क्लीनचिट-दोष-आरोप जारी हुए और चल रहा है। एक गिद्ध ने तो अपने ही कार्यकाल में हुए घोटालों को छिपाने के लिए और लोगों का मुंह बंद करने के लिए दो दर्जन आरटीआई लगा दिया है। खैर प्रशासनिक जांच में इसका रहस्योद्घाटन होगा, फिलहाल यह विषयांतर होगा। qqq साल 2012 के बाद छात्रों का इंजीनियरिंग से मोह भंग होना शुरू हो गया था जिसकी माया केआईटी में भी आई। जिस समय केआईटी को मजबूत करना था जिम्मेदारों ने खुद को मजबूत किया, आत्मनिर्भर बन गए, घोटाले-दर-घोटाले होते रहे। आदिवासी क्षेत्र का सबसे पहला कॉलेज सबसे मंहगा कॉलेज भी एक समय बन गया। एक तो मोहभंग और दूसरा फीस का बढ़ना केआईटी को गर्त में ले गया। स्व-वित्तपोषित संस्था के पास पैसे खत्म होने लगे। फिर डीएमएफ फंड से 6 महीने का स्टाफ खर्चा मिला लेकिन जब पैसा है ही नहीं तो कॉलेज कैसे चलेगा। अभी 13 महीने से यहां स्टाफ को तनख्वाह नहीं मिली है। बच्चों की तादाद 150 के आसपास है तब जब दो नए ब्रांच खुले। qqq भावी/भूतपूर्व इंजीनियर अपना विषय भले ही न जानते हों पर बोर्ड ऑफ गवर्नर (बीओजी) जरूर जानते हैं जो सारे फैसले लेती है ऐसे फैसले जो कभी समय पर नहीं हुए और जिनका कोई अर्थ नहीं। अभी तक बीओजी का मुखिया दूसरे जिले का होता था पर इस बार तो अपने जिले का है जिसने केआईटी को डूबने नहीं देने का वायदा भी किया, खुद मुझसे उन्होंने कहा कि मैं केआईटी को बंद नहीं होने दूंगा। मैंने मुख्यमंत्री से भी पूछा तो उन्होंने आश्वासन दिया। केआईटी के लिए एक नई तरकीब निकल कर आई कि यहां अन्य कोर्सेस खोले जाएं और केआईटी फिर से आत्मनिर्भर बनेगा। रायपुर से फतवा आया कि बीफार्मा खोला जाए। अब टेक्निकल कॉलेज और बीफार्मा में बदलेगा तो पुराने स्टाफ का क्या। वैसे भी फार्मा में जिले में बहुत शक्ति लगी है। कल शाम को बीओजी की एक और बैठक हुई मुखिया बोले केआईटी शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज बनेगा, पैसा डीएमएफ से पास हो गया है जल्द ही मिल जाएगा। केआईटी को शासकीय कॉलेज बनने का सब्ज बाग देखते-देखते दो दशक और हजारों छात्र निकल गए। केआईटी की नई बिल्डिंग आज एक विश्वविद्यालय है और एकदम नया चकाचक वाला कोविड केयर क्योंकि छात्र तो घर पर ही हैं। अगर केआईटी का समय रहते कुछ नहीं किया तो बस मौत की आखिरी हिचकी उसे आने ही वाली है।
परंपरा, आधुनिकता और स्त्री का अंर्तद्वंद्व
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के स्त्री के परिधान को लेकर एक बयान पर काफी बवाल मचा हुआ है खासकर फटी जींस पहनी एक एनजीओ चलाने वाली स्त्री पर उनकी टिप्पणी। उन्होंने तो फटी जींस ही कहा है, मेरे व्यक्तिगत विचार से तो चीथड़ों में लिपटी हुई आधुनिकाएं ज्यादा उपयुक्त शब्द है। हालिया खबर यह है कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने अपने बयान पर माफी मांग ली है और कहा है किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना उनका मकसद कतई नहीं था। चलिए किस्सा खत्म हुआ क्योंकि यही उनका उद्देश्य था जो पूरा हो गया, सवाल यह है कि हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने वाली और स्वतंत्रता के नाम पर अमर्यादित बयानबाजी करने वाली स्त्रियां मुझे स्त्री विमर्श पर संवेदित होने वाली महिलाएं कभी नहीं लगती। जया बच्चन जी का ही उदाहरण लें तो उन्हीं के पार्टी प्रमुख ने कभी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर कहा था कि लड़कों से गलतियां हो जाती हैं। ऐसे बेशर्म वक्तव्य पर जया जी की मुखरता कहां लुप्त हो गई थी। हमारे अपने प्रदेश की महिला आयोग की अध्यक्षा का यह कहना कि उत्तराखंड के सीएम का बयान एक घटिया और कुंठित बयान है अध्यक्षा ने तो स्त्री के घुटनों पर फटी जींस और पुरुषों के घुटनों तक पैंट की आपसी तुलना तक कर डाली, बेहद हास्यास्पद और असंगत लगी यह तुलना जो उनके मानसिक प्रदूषण को दर्शाती है। खुद उनके अपने प्रदेश में स्त्री का क्या स्थिति है यह बेहतर जानती हैं। स्त्री हमारे समाज में हमेशा से पूज्यनीय रही और रहेगी। यह और बात है कि चंद दकियानूस लोग उसके चरित्र का आकलन पहनावे या ओढ़ावे से करते हैं। पहनने की आजादी अगर स्त्री को है तो उस पर टीका टिप्पणी भी अभिव्यक्ति की आजादी के अंदर ही आएगी। यदि मुख्यमंत्री जी ने ऐसी टिप्पणी की भी तो वह हिंदू संस्कृति और उसके सांस्कृतिक परिवेश को लेकर की होगी जिस पर तमाम स्त्री वर्ग से प्रतिक्रियाएं उठनी शुरू हो गईं। ऐसी 90 फीसदी महिलाएं खुद अपने परिवार में परंपरागत परिधानों को त्याग कर फटी जींस (चीथड़ों) पहनकर विवाह मंडप में बैठेगी या विवाह संपन्न करेगी उस दिन यह स्त्री स्वातंत्र्य का नायब नमूना पेश करेगी लेकिन नहीं शायद ऐसा कभी ऐसा संभव ही नहीं हो पाएगा क्योंकि फैशन के तौर पर ऐसे चीथड़े पहनने वाली स्त्रियां आधुनिकता का प्रतीक मानती हैं लेकिन मानसिक तौर पर वह कतई आधुनिक नहीं होती। चंद अंगुलियों पर गिनती की जाने वाली युवतियों को छोड़ दें तो तमाम स्त्रियों के भीतर एक ऐसी स्त्री हमेशा से मौजूद होती है जो अपनी परंपराओं की मर्यादा को जानती है उसके सौंदर्य पक्ष को ताकतवर होकर अनुशाषित ढंग से संवारती भी है उसे पता है कि फटी जींस पहनकर जीवन के लंबे कालखंड की पारी नहीं खेली जा सकती। अंत में एक सवाल : क्या ऐसे मंहगे चीथड़े पहनकर अपना वैभव प्रदर्शन करना उन गरीबों के साथ एक भोंडा मजाक नहीं है जिनके नसीब में ही चीथड़े पहनना लिखा है। (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
महज देह नहीं है स्त्री
लंबाई×चौड़ाई=क्षेत्रफल, यह स्कूली शिक्षा में पता चला। लंबाई×चौड़ाई=क्षेत्रफल, महाविद्यालयीन शिक्षा में एक कदम बढ़कर यह ज्ञान मिला कि किसी देश का भौगोलिक क्षेत्रफल जितना बड़ा होगा उसकी प्रभुता और शक्ति उतनी ही बड़ी होगी। यह सब किताबी ज्ञान है और असल जिंदगी किताबी ज्ञान से बिल्कुल अलग होती है। जिंदगी की किताब का पहला पन्ना पटलते ही पता लगा कि लंबाई और चौड़ाई का क्षेत्रफल स्त्री देह भी होती है। यह भी जाना कि स्त्री का भूगोल महज उसकी देह होती है और उसकी परिधि ही उसका प्रथम परिचय है, उसका यह भूगोल ही उसके भूत-वर्तमान और भविष्य का इतिहास है। यह नहीं जाना कि इस स्त्री देह में जो रक्त बहता है, जो आत्मा स्पंदित होती हैं या जो कामनाएं पनपती हैं वह पुरुषों से किसी मायने में कम नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं ईश्वर ने स्त्री और पुरुष की संरचना में फर्क जरूर किया है और यह फर्क स्त्री की बेहतरी के लिए किया। उसे सृजनात्मक शक्ति दी तो साथ में सेवा, सुश्रुषा और वात्सल्य जैसे गुण दिए जिन गुणों को पुरुषों को सीखना पड़ता है वह स्त्री के नैसर्गिक गुण होते हैं और उसके इसी नैर्सिगक गुणों का बेजा इस्तेमाल समाज ने या और स्पष्ट कहें तो पुरुष किया जो वर्तमान में भी जारी है। अखबारों में आज जब हम पढ़ते हैं कि एक ऑटोचालक की बेटी मिस इंडिया बनी या अमिताभ बच्चन के गेम शो में अलग-अलग वर्गों से आईं चार स्त्रियां करोड़पति बनी या फिर पहली बार हमारे देश की युवतियां फाइटर प्लेन उड़ाएंगी तो बड़े गर्व की अनूभूति होती है। जिसे हम महिला सशक्तिकरण की दिशा में हो रहे सार्थक प्रयास मानते हैं। पर रूकिये जरा हम अपने देश के इतिहास को खंगाले तो पाएंगे आज से 75 या 80 वर्ष पूर्व भी हमारे देश की नारियां ऐसे कार्य कर चुकी हैं। चाहे वह आजाद हिंद फौज के स्त्रियों की टुकड़ी हो जो छापामार युद्ध से लेकर जासूसी में निषनात थीं, स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय रही थी या शिक्षा की अलख जगाती रहीं। समर्थवान होने पर सामाजिक कार्य तक संपन्न किए हैं और आवश्यकता पड़ने पर युद्ध भी संचालित किए हैं। फिर यह अचानक क्या हुआ हमें फिर से महिला सशक्तिकरण की जरूरत महसूस होने लगी। दरअसल जब से हमारी संस्कृति पर बाजारवाद हावी हुआ तब से बाजार की ताकतों ने समाज को अपनी उंगलियों पर कठपुलियों की तरह नचाने पर मजबूर कर दिया जिसकी शिकार स्त्रियां ही अधिक हुईं और पुरुष उसके माध्यम बन गए। आधुनिकता के नाम पर बाजार ने स्त्री को ढाल बनाकर जो फूहड़ता परोसी उसे स्त्री आजतक नहीं समझ पाई। भाषा, कपड़े, साहित्य, मनोरंजन आदि सभी क्षेत्रों में नकली आधुनिकता का ताना-बाना बुना गया उसने स्त्री के सोचन-समझने की क्षमता का अपहरण कर लिया ऐसी आधुनिकाएं जब स्वतंत्रता का झंडा लेकर उच्श्रृंखलता का प्रदर्शन करती हैं तो यह छद्म नारीवाद है। महज अपनी भाषणों में स्त्री स्वतंत्रा के नारे लगाने वाली ये सूडो फेमिनिस्ट महिलाएं पर जब बात जमीन पर उतरने की आती है तब उन्हें भी पुरुषों के बैसाखी की जरूरत होती है। यहां उल्लेख करना चाहूंगी हिंदी के प्रख्यात लेखक गजानंद माधव मुक्तिबोध से किसी ने पूछा था कि यह दुनिया क्यों टिकी है तब उनका जवाब था दुनिया स्त्री-पुरुषों के संबंधों के कारण टिकी है, जिस दिन स्त्री-पुरुष संबंध समाप्त हो जाएंगे, दुनिया खत्म हो जाएगी। यहां मुक्तिबोध का आशय जिस संबंध से वह महज दैहिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक-आध्यात्मिक संबंधों से है जो देह से बहुत ऊपर है। इसे वर्तमान में स्त्री से ज्यादा पुरुषों को समझने की जरुरत है और जिस दिन यह बात उन दोनों के समझ में आ जाएगी, दुनिया फिर खूबसूरत हो जाएगी। स्त्री के साथ होने वाली हिंसा स्वंय कम हो जाएंगे। स्त्रियां यह बात समझ चुकी हैं बस पुरुष का अहंकार इसे समझ नहीं पा रहा है। (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
हैप्पी मदर्स डे केलो....
नदी पूज्यनीया होती हैं इनकी पूजा अस्वाभाविक नहीं है, ऐसी पूजा तो प्रतिदिन होनी चाहिए। हमारे देश के अनेक जगहों पर इस तरह की पूजा संपन्न भी की जाती हैं। इसी कड़ी में हमारे जिले की जीवन रेखा केलो नदी भी पूजा और श्रद्धा की हकदार है, इसके किनारे बसे सैकड़ों गांव और शहर इससे अपनी जरूरतें पूरी करते हैं। वैसे ही केलो नदी की अपनी जरूरत होती है अगर केलो नदी हमें जीवन देती है तो उसके अस्तित्व को बचाए रखने का दायित्व किसी और का नहीं बल्कि हमारा ही है। साल के एक दिन नदी की पूजा और आरती करते हुए हमें इस बात पर भी सोचना होगा कि साल के शेष दिनों में हमारा बर्ताव उसके प्रति क्या है? यह जगजाहिर है कि केलो का अस्तित्व खतरे में है औऱ इसे बचाने की एक ईमानदार कोशिश हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता में होनी चाहिए। इसलिए हमें अपने आप से सवाल पूछना होगा कि केलो को इस दुर्दशाग्रस्त अवस्था में लाने में हमारी अपनी भूमिका क्या रही है? यहां जब हम अपनी बात करते हैं तो उसका दूसरा अर्थ हमारे जनप्रतिनिधियों से होता है जिन्हें हम विश्वास के साथ पंचायतों से लेकर संसद तक भेजते हैं कि वे हमारे हित-अहित का ध्यान रखें और अपने उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से हमारे दुख और तकलीफों का समाधान निकालें। महज एक दिन की महाआरती और शेष दिन की उदासीनता एक ज्वलंत मुद्दा है उन सभी के लिए। अब यदि बात केलो नदी की करें तो इतिहास यह बताता है कि लैलूंगा के पहाड़ लुड़ेग नामक ग्राम की घाटियों से निकली यह नदी लगभग 190 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। जानकार यह भी बताते हैं कि किसी समय यह मध्य भारत की एक स्वच्छ जल वाली नदी थी क्योंकि जल शुद्धिकरण हेतु जितने खनिजों की आवश्यकता होती है वह सब नैसर्गिक रूप से इसके प्रवाह के रास्ते में मौजूद थे। आज भी रायगढ़ के कई वृद्ध या बुजुर्ग स्त्रियां गवाह होंगे कि कार्तिक माह में जब वे पूजन और दीप प्रवाह के लिए केलो के घाट में जाती थीं तो तकरीबन ऐसा प्रतीत होता था कि स्वंय आसमान जमीन पर आ गया हो। साफ स्वच्छ केलो में तैरते सैकड़ों प्रज्जवलित दीप की छटा रमणीय होती थी। यह कोई अतीत की नहीं महज 20-25 वर्ष पूर्व की बात है। औद्योगिकीकरण के चलते और उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट को केलो में प्रवाहित करने के चलते केलो प्रदूषित होती ही गई और यह सिलसिला आज भी निरंतर जारी है। जनप्रतिनिधि आए-गए उनके द्वारा लुभावने वादों का सपना भी बुना गया लेकिन कमी जो रही वह थी एक फौलादी ईमानदार कोशिश की। एक बार निगम ने कोष्टा पारा में 2010 के आसपास वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाया था जो बमुश्किल 10 दिन चला होगा और उसके बाद आजतक बंद है। 14 जनवरी को संपन्न होने जा रहे इस मेगा शो की तैयारी महज उसके तीन चार तीन पहले और शो के दो-तीन दिन बाद तक सिमट कर रह जाती है। यदि हम कहें कि केलो आज मरणासन्न अवस्था में है तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी इसमें रहने वाली कई जलचर प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और जो मौजूद हैं वो तकरीबन विलुप्ति के कगार पर है। नदी में मौजूदा पानी की स्थिति यह है कि नहाने पर कई चर्म रोगों का खतरा है। इसकी दशा अब भी न संभली तो आने वाले समय में रायगढ़ शहर में जल संकट की नौबत आ सकती है। लाखों रुपये खर्च कर हजारों की भीड़ इकट्ठी कर ऐसे मेगा शो के आयोजन के माध्यम से हम अपनी उत्सवधर्मी मानसिकता का परिचय देकर भले ही ताली बटोर लें लेकिन इसे केलो के साथ एक क्रूर मजाक कहना होगा, यह मेरी अपनी राय है। बल्कि, मेरी तो गुजारिश है यहां के जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों से कि वे बिलासपुर अरपा नदी के संरक्षण के लिए गठित अरपा विकास प्राधिकरण की तरह केलो विकास प्राधिकरण बनाने की मांग शासन के पास रखे ताकि अंतिम सांसे ले रही केलो को नया जीवन मिल सके। तब तक के लिए मनाने और देखने वालों की तरफ से हैप्पी मदर्स डे केलो मईया...364 दिन बाद फिर मिलेंगे हालत शायद और बदतर हो जाए या कुछ सुधर भी जाए। हम दोनों का मिलना तो नियति है। (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
कलेक्टर भीम सिंह ने भारी बारिश के बीच संभाला मोर्चा, देखें तस्वीरें
निगम अमला बीती रात से आयुक्त के साथ पूरे शहर में डटा हुआ है
तस्वीरों में देखें रायगढ़ में जनता कर्फ्यू का असर
22 मार्च यानी रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर जिले में भी जनता कर्फ्यू का असर देखने को मिला। दोपहर तक पूरा शहर स्वस्फूर्त बंद था। हर मुख्य मार्ग और बाजार बंद मिले। गली-कूचे तक कोई व्यक्ति बाहर नहीं निकला।
हरि बोल, जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ निकली रथयात्रा, देखें गैलरी
रायगढ़ में दो दिनों की रथयात्रा आयोजित होती रही है। इसी क्रम में आज रथ द्वितिया के दिन शहर के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर से भगवान श्री को विधिविधान पूर्वक पूजा अर्चना पश्चात मंदिर के गर्भगृह तथा मंदिर परिसर से जय जगन्नाथ के जयघोष और घंट शंख ध्वनि के बीच ससम्मान बाहर निकाला गया। राजापारा स्थित प्रांगढ़ में मेले सा माहौल था और हजारो की संख्या में श्रद्धालु भक्तगण भगवान श्री के दर्शन करने के लिए पहुंचे हुए थे। इससे पहले कल भगवान जगन्नाथ की विधि विधान से पूजा की गई जिसे फोटोग्राफर वेदव्यास गुप्ता ने अपने कैमरे में कैद किया।
इप्टा रायगढ़ के 25वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की झलकियां
27 से 31 जनवरी तक पॉलिटेक्निक ऑडिटोरिम में इप्टा रायगढ़ द्वारा 25वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। जिसमें चार नाटक एवं दो फीचर फिल्में दिखाई गईं। समारोह की शुरुआत रायपुर के मशहूर रंगकर्मी मिर्जा मसूद को 10वां शरदचंद्र वैरागकर अवार्ड देकर की गई। यह कूवत सिर्फ रंगमंच रखता है जो वर्तमान सत्ता के मठाधीशों पर अजब मदारी गजब तमाशा नाटक के माध्यम से सीधे कटाक्ष कर सकता है। जहां एक मदारी को राजा बना दिया जाता है, शब्दों के अस्तित्व को खत्म कर दिया जाता है। बंदर राष्ट्रीय पशु बन जाता है। गांधी चौक नाटक में गांधीजी की प्रतिमा स्वयं यह चलकर वहां से हट जाती है कि जब रक्षक की भक्षक बन गए तो कोई क्या कर सकता है। नोटबंदी और जीएसटी पर गांव वाले सीधे प्रहार करते हैं। सुबह होने वाली है की लेखी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध होने के बाद लोगों को जागरूक करने को किताब लिखती और किताब को ही फांसी हो जाती है। बोल की लब आजाद हैं तेरे लोगों को दर्शकदीर्घा में झकघोर के रख देती है। तुरूप और भूलन जैसी फिल्में लोगों के मनोरंजन के अलावा दमदार संदेश भी देती है। तो देखें इस शानदार नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की कुछ झलकियां
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