raigarh express

Raigarh Express, news of raigarh chhattisgarh

Wednesday, October 21, 2020
raigarh express
मोहल्ले-मोहल्ले होगी लोगों की प्राथमिक जांच
मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना की जिले में हुई शुरुआत, 45 से अधिक ब्लड-यूरिन टेस्ट और प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा
आसपास
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सावधानी ही बचाएगी : ठंड और त्यौहारी सीजन में कोरोना संक्रमण का खतरा अधिक
हमारे बच्चे
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ट्विन साइक्लोनिक सर्कुलेशन के बीच मॉनसून विड्रॉल कुछ दिनों में
मौसम
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स्वयंभू नेताओं के संरक्षण में सरकारी जमीन पर बन गया कांप्लेक्स, ताकते रहे अधिकारी
राजनीति
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होम आइसोलेशन में जरा सी भी लापरवाही खतरनाक
आसपास
मोहल्ले-मोहल्ले होगी लोगों की प्राथमिक जांच
मुख्यमंत्री स्लम स्वास्थ्य योजना की जिले में हुई शुरुआत, 45 से अधिक ब्लड-यूरिन टेस्ट और प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा
होम आइसोलेशन में जरा सी भी लापरवाही खतरनाक
सीएमएचओ कार्यालय में बनाए गए दो टेलीफोनिक कंट्रोल रूम,मरीज की एक कॉल पर देते हैं परामर्श
टेंडर दस्तावेज में ओवर राइटिंग मामले में कमिश्नर ने बनाई जांच कमेटी
फॉलोअप : फर्जीवाड़ा करने वाले के विरूद्ध सख्त कार्रवाई के संकेत
आबकारी विभाग की नई एजेंसी गार्डो से कर रही अवैध वसूली
जिले भर के शराब दुकानों के सुरक्षा गार्डो ने आबकारी सहायक आयुक्त से की शिकायत
स्वयंभू नेताओं के संरक्षण में सरकारी जमीन पर बन गया कांप्लेक्स, ताकते रहे अधिकारी
पुसौर नगर पंचायत और तहसील का स्टे होने के बाद भी लाखों की जमीन पर हो गया अवैध कब्जा
निगम की सामान्य सभा 28 अक्टूबर को, शहर सरकार को घेरने की तैयारी में विपक्ष
टेंडर में चल रही मनमानी को लेकर हंगामे के आसार
ठेका ए निगम : बिलो दर मे ओवर राइटिंग कर हड़पे जा रहे टेंडर
निगम ठेकेदार का सनसनीखेज आरोप, आयुक्त और महापौर से की लिखित शिकायत, कुछ कर्मचारियों पर भी आपराधिक षड्यंत्र रचने का आरोप
महापौर के बिना सम्बलपुरी शहरी गोठान का हुआ भूमि पूजन, हंगामे के आसार
ठेकेदार को बिना वर्क ऑर्डर दिए भूमि पूजन की हड़बड़ी पर फिर उठे सवाल, एमआईसी को भी टेंडर के बाद राशि स्वीकृति के लिए नहीं भेजी फाइल
ट्विन साइक्लोनिक सर्कुलेशन के बीच मॉनसून विड्रॉल कुछ दिनों में
प्रदेश के कुछ हिस्सों में कल हल्की बारिश की सम्भावना
वीकेंड में यलो अलर्ट, गरज चमक और बारिश की चेतावनी
अधिमास में मौसम हर दिन बदल रहा है। बीते 3 दिनों से धूप छांव और हल्की हल्की फुहार से शहर का तापमान काफी गिर गया है शाम को हल्की ठंडी महसूस हो रही है।सुबह ओस पड़ने लगी है। मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की है आगामी शनिवार और रविवार को गरज चमक के बारिश की संभावना है। वहीं शुक्रवार को गुरुवार जैसे रिमझिम बारिश देर शाम होने की संभावना जताई है। मॉनसून विड्रॉल लाइन वर्तमान में लखीमपुर खेरी, शाहजहां पुर, अलवर, और नागपुर से गुज़र रही है और इसके आने वाले 2 दिनों में उत्तरप्रदेश, राजस्थान और उत्तर पश्चिम मध्यप्रदेश से निकल जाने की संभावना है। मौसम विज्ञान विभाग रायपुर से प्राप्त जानकारी के अनुसार दक्षिण पश्चिम मानसून प्रदेश के लिए मुख्य वर्षा का सीजन है जो 1 जून से 30 सितंबर तक माना जाता है। प्रदेश के लिए मानसून सीजन में औसत सामान्य वर्षा 1140.1 मिलीमीटर है। वर्ष भर में होने वाले वर्षा का लगभग 90% वर्षा दक्षिण पश्चिम मानसून से, 2% शीत ऋतु में, 3% पूर्व मानसून सीजन में, और 5% वर्षा पोस्ट मानसून सीजन में होता है। माह जुलाई और अगस्त में मानसून सीजन का 58% वर्षा प्राप्त होता है। विदित को कि छत्तीसगढ़ में वर्षा मुख्यतः निम्न दाब के क्षेत्र और मानसून अवदाब जो बंगाल की खाड़ी में दक्षिण पश्चिम मानसून ऋतु में होता है। सामान्यता मई, जून, अक्तूबर और नवम्बर में चक्रवात बनता है, जिससे प्रदेश सामान्यतः प्रभावित होता है। प्रदेश में जुलाई और अगस्त के महीने में सबसे अधिक वर्षा होने के कारण भारी से अति भारी वर्षा का समय जुलाई और अगस्त महीने ही रहता है, साथ ही कभी-कभी सितंबर में भारी वर्षा दर्ज की जाती है।
मॉनसून की विदाई आज से शुरू
अभी भी 5-10 प्रतिशत बारिश की आशा
अधिक मास में कुछ तरावट की उम्मीद
उमस से राहत की आशा, आज और कल बारिश की संभावना
सावधानी ही बचाएगी : ठंड और त्यौहारी सीजन में कोरोना संक्रमण का खतरा अधिक
अति उत्साह और त्योहारी खुमारी में अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने से बचे : सीएमएचओ केसरी
मदद के लिए जेसीआई के बढ़े हाथ, कोरोना को देंगे मात
जेसीआई के 77 कार्यकर्ता बीते 6 महीने से दे रहे अपना सहयोग
अपनी सुरक्षा अपने हाथ : ग्लोबल हैंडवाश डे आज
सभी वार्डों में मनेगा हैंडवाश डे, स्कूली बच्चों को ऑनलाइन किया जाएगा जागरूक
वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे : शारीरिक, मानसिक सामाजिक और आर्थिक रूप से स्वस्थ होना जरूरी
मानसिक बीमारियों को रोका जा सकता है सिर्फ इसे समय पर समझें
अजय ने इस शहर से वो वादे निभाये हैं, जो इस शहर ने मांगे न थे
हम रायगढ़ वाले अपनी तरह से अगर राजकपूर को लें, उसमे दादा साहब फाल्के मिलाएं, हबीब तनवीर को शक्कर की तरह बुरकें, बाबा नागार्जुन की फक्कड़-मस्ती का वर्क लगायें, और इस मिश्रण को बड़े भाई की पैकेजिंग में सामने रखे, तो जो मीठी मीठी डिश बने - वो भाऊ होते है। अजय आठले- रंगकर्मी, शोमैन, ऑर्गनाइजर, विचारक, एक्टिविस्ट, धीर गम्भीर, चिन्तामुक्त, हंसता.. जी हल्का कर देने वाला शख्स। कॅरोना ने छीन लिया। रायगढ़ इप्टा उनकी सृजनशीलता से उठी है। साधारण लोगो मे टैलेंट खोजकर उसे रंगमंच की स्पॉटलाइट में खड़ा कर देना, पहचान देना, आत्मविश्वास भर देना भाऊ का शगल रहा। जितनी प्रतिभाओं को उन्होंने तराशा, वो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से लेकर मुबई की मायानगरी तक उनका नाम लेते हुए पताका लहरा रहे हैं। साल में एक बार आयोजित होने वाला पांच दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य समारोह, यह ज्योतिपुंज खुद जलकर आयोजित करता। देश का हर नामी गिरामी रंगमंच का स्टार और मशहूर नाटक हमने अपने शहर में देखे हैं। तमाम सरकारी फंड और तामझाम के साथ होने वाले चक्रधर समारोह के मुकाबले इप्टा का यह एकल प्रयास, बराबर छूटता था। रायगढ़ को कल्चरल सिटी और संस्कारधानी का दर्जा क्लेम करने में यह कार्यक्रम बड़े अंक देता। इसे भाऊ का योगदान कहना अतिश्योक्ति न होगी। रायगढ़ इप्टा की ओर से दिया जाने वाला शरदचन्द्र वैरागकर सम्मान किसी भी रंगकर्मी के सीने पर जीवन भर की उपलब्धियों का बड़ा बैज है। बरसों पहले छह फुटे इस शानदार व्यक्तित्व लांग कोट पहने, डिग्री कालेज के वार्षिकोत्सव में देखा था। वह छवि दिल मे बस गयी। कुछ बरस पहले मैनचेस्टर में ठीक वैसा कोट दिखा। चट से खरीदा, कभी कभी पहनता हूँ, पर हम मोर्टल्स में वो बात कहां। हम उनके जैसा दिख नहीं सकते, बन नहीं सकते। बस, रश्क कर सकते है, आदर कर सकते हैं। कुछ दिनों पहले भगतसिंह पर चर्चा के लिए उन्होंने बुलावा दिया। यह कोई दादा साहब फाल्के सम्मान से कम न था। जब बातचीत चल रही थी, वे कैमरे के पीछे से चर्चा देख रहे थे। एक बार कैमरा बन्द हो गया, चर्चा चलती रही। फिर रीटेक हुआ, मगर थॉट्स और शब्द समान नही थे। मगर भाऊ वैसे ही मजा लेते रहे। लॉक डाउन के दौरान उनके पास मिलने गया था। यह एक ही बार है जब उनके घर गया। खानदानी लोग हैं, पर सादा रहन सहन, कोने कोने से वही बौद्धिकता और विचार झलकते जिन्हें आप उनकी बातों में पाते है। जो अनुरोध किया था, उन्होंने लाकडाउन खत्म होने के बाद कोशिश करने का वादा किया था। टूट गया। फिर उनके स्वास्थ्य की कामना को लेकर पोस्ट लिखी। उनका जवाब आया, स्वस्थ होकर मिलते हैं। वह वादा भी टूट गया। मगर अजय आठले ने इस शहर से वो वादे निभाये है, जो इस शहर ने मांगे न थे। स्वेच्छा से समाज के लिए, कला के लिए, पैशन के लिए पूरे किए गए अनकहे वादे एक शख्स को कितना बुलन्द बना जाते है, अजय आठले के कद से जाना जा सकता है। भाऊ को सलाम। पर अंतिम नही.. हम ये सलाम हमेशा करते रहेंगे।
रंगकर्म एक जुनून है,ताउम्र इसे जिंदा रखने की कला अजय के पास थी
कल सुबह-सुबह दिल को झकझोर देने वाला समाचार मिला अजय आठले नही रहे। रायगढ़ की रंगकर्मियों और कलासाधकों की बिरादरी के लिए एक अपूरणीय क्षति है। रायगढ़ को रंगकर्म के क्षेत्र में देशव्यापी स्थान दिलाने में अजय की महत्वपूर्ण भूमिका है। वैसे तो रायगढ़ में रंगकर्म को लेकर एक स्वाभाविक परंपरा विद्धमान थी किंतु देश के क्षितिज में रायगढ़ के रंगकर्म की निरंतरता और रंगकर्मियों की तीन पीढ़ी तैयार करना और संवाद कायम रखना अभूतपूर्व है। अतीत के 1980-81 के वे दिन मेरी स्मृतियों में कौंध रहे हैं जब हम सबने इप्टा की रायगढ़ इकाई का गठन किया था उस दौर में रायगढ़ में कॉमरेड मुमताज भारती प्रगतिशील आंदोलन के मुख्य स्तंभ और प्रेरणा स्रोत थे प्रगतिशील लेखक संघ की रायगढ़ इकाई सक्रिय थी और इप्टा के गठन की सक्रियता की जरूरत थी। एक महत्वकांक्षी निर्णय लिया मध्यप्रदेश इप्टा के प्रथम राज्य सम्मेलन के आयोजन का। रायगढ़ इकाई के निर्णय से उत्साहित भोपाल से डॉ कमला प्रसाद और जबलपुर से ज्ञानरंजन के मार्गदर्शन का सिलसिला प्रारम्भ हुआ रायगढ़ के राज्य सम्मलेन का शुभारंभ प्रख्यात साहित्यकार भीष्म साहनी जी के द्वारा किया गया। देश के प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई और रायगढ़ से वरिष्ठ रंगकर्मी उमाशंकर चौबे के संरक्षण में मध्यप्रदेश में इप्टा की राज्यव्यापी इकाइयां गठित की गईं। रंगकर्म को निरंतर 40 वर्षों तक किसी भी कस्बाई शहर में जीवित रखना कम चुनौतीपूर्ण नही है। लेकिन ऐसे असाध्य काम को जारी रखने का हौसला अजय आठले का नाम है। हमारी रंगकर्म की यात्रा शुरू हुई विजय तेंदुलकर के नाटक पंक्षी ऐसे आते हैं, मुझे याद है रंगकर्म की स्लेट हमारे जेहन में काली थी। समझने और सीखने की ललक हमे तब कलकत्ता लेकर गई और हमने साथ मे यही प्रोडक्शन रविन्द्र भवन में साथ मे देखा जो प्रख्यात रंगकर्मी श्यामानंद जालान का था। रंगकर्म एक जुनून है और ताउम्र इस जुनून को जिंदा रखने की कला अजय के पास थी। 1994 -95 से एक नया दौर शुरू होता है इप्टा के वार्षिक रंग महोत्सव का, अभी हाल में ही इसकी रजत जयंती मनाई गई। इसमें रायगढ़ ने देश की विभिन्न रंगमण्डलियो के शताधिक नाटक देखे और रंगकर्मियों ने भी ऊर्जा ग्रहण की। इसमें प्रख्यात रंगकर्मियों रंगनिर्देशकों के नाटक हुए। हबीब तनवीर,ऊषा गांगुली, बंशी कौल, देवेंद्रराज अंकुर,मिर्ज़ा मसूद, संजय उपाध्याय, सुमन कुमार, अरुण पांडेय, रघुवीर यादव,राजकमल नायक जैसे कई नाम जिनके नाटक रायगढ़ ने इन समारोह के दरमियान देखे। इन समस्त आयोजनों ने रायगढ़ के रंग परिवार को समृद्ध किया और इसकी देश व्यापी दस्तक सुनाई दी। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा जैसी विख्यात संस्था में भी रायगढ़ से योगेंद्र चौबे और स्वप्निल कोत्तरीवर का चयन इसी रंग विरासत की देन है ऐसे आयोजन के केंद्र में अजय आठले की सक्रियता थी और उसकी भरपाई असम्भव है, साथी ऊषा आठले एक समर्थवान साहित्यकार रंगकर्मी और एक्टिविस्ट हैं। रायगढ़ की रंग बिरादरी उनके साथ हमेशा खड़ी रहेगी। प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा बुनियाद से ही साथ - साथ है। राष्ट्रीय स्तर पर लेखकों और रंगकर्मियों के रिश्ते हमेशा मनुष्यता और इसकी बेहतरी के पक्ष में संघर्षरत हैं और रहेंगें । आज जब इसकी और जरूरत है बेहद अफ़सोस होता है ये कहते हुए की अलविदा साथी अजय।
और जब सारंगढ़ हाईकोर्ट का फैसला वायसरॉय भी नहीं पलट सके
कहानी स्वतंत्र प्रिंसली स्टेट सारंगढ़ की
विश्वगुरु भारत और गोमर्डा अभयारण्य बनने की कहानी
यूं तो विश्वगुरु नाम की कोई ऑफिशियल पोजिशन नही है। यूनेस्को भी भारत को विश्वगुरु बनाने का कोई मैसेज, आप तक भेजा नही है। मगर 1972 की स्टॉकहोम कांफ्रेंस में भारत ने वन्यजीव और पर्यावरण संरक्षण के मामले में विश्वगुरु जरूर बना दिया। किस्सा शुरू होता है 1968 से। तब यूनाइटेड नेशंस ने दुनिया की बढ़ती मानवीय आबादी, और उसके द्वारा वन्य जीवों के क्षेत्र तथा प्राकृतिक संसाधनों के अतिक्रमण पर स्टडी की। एक कन्वेंशन बुलाने का निर्णय हुआ। विश्वसभा बुलाते बुलाते 1972 आ गया। 5 जून 1972 से यह कांफ्रेंस स्टॉकहोम में आयोजित हुई। नया विषय था, देशों की रुचि कम थी। दुनिया के देशों ने छोटे छोटे अफसरों, मंत्रियों को भेजकर अपना कोरम पूरा किया। यह भारत ही अकेला था, जिसकी हेड ऑफ गवर्मेन्ट, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद पहुंची। दिन था 14 जून 1972, इंदिरा ने पर्यावरण, वन्यजीवन और गरीबी उन्मूलन को अन्तर्सम्बन्ध जोड़ते हुए, एक स्पीच दी। उस जानदार स्पीच को स्टैंडिंग ओवेशन मिला और इसके साथ इस मुद्दे पर लीडरशिप और निगाहें भारत की ओर आ गयी। कोई और दौर होता तो अगले दिन अखबारों की सुर्ख़ियों में नेता की तारीफ के फोटो आने के बाद मामला भुला दिया जाता। मगर, इंदिरा नेता जरा दूजे किस्म की थी। जो बीड़ा उठाया वह तीन माह के भीतर पूरा किया। सितंबर में भारत पहला देश था, जिसने वन्यजीव संरक्षण एक्ट ( Wildlife protection act of 1972) पास किया। -- इस एक्ट को आप शायद सलमान खान के चिंकारा केस की वजह से याद करें। मगर इसका असल योगदान भारत मे नेशनल पार्क और अभयारण्यों की स्थापना से हुआ। पहली बार दुनिया मे मनुष्य के लिए हद निर्धारित हुई। जिससे आगे प्रकृति का कानून, उसका नियम चले और उसके दूसरे बच्चों को मानव से अभय मिले। इस कानून ने आगे चलकर प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलिफेंट, प्रोजेक्ट क्रोकोडाइल, और तमाम दूसरे काम हुए। जिससे जानवरों के जीवन के अधिकार को मानव के जीवन के अधिकार की तरह तवज्जो मिली। किसी भी तरह का शिकार, एवम उससे जुड़ा व्यापार पनिशेबल ऑफेंस हुआ। भारत का यह कानून बहुतेरे देशो ने अध्ययन किया, और अफ्रीका से यूएस तक इस तरह के कानून बने। -- कानून बनाना एक बात है, और उसे जमीन पर लागू करना दूसरा। आसान नही है, वनों में रहने वाले लोगो को समझाना, उनके पारम्परिक अधिकारों मान्यताओं के विरुद्ध समझाना और किसी जंगल को सिर्फ पशु पक्षियों के लिए छोड़ने को प्रेरित करना। राज्य सरकारें इस ओर हाथ डालने को तैयार नही थी। इंदिरा ने एक लाख का इनाम रखा, उन सरकारों के लिए जो इस एक्ट में पहले काम करके दिखाएं। तमाम सरकारों पर चौतरफा दबाव भी था, और मध्यप्रदेश सरकार पर भी। जेजे दत्ता, भारत के नामचीन पर्यावरणविद, वन्यजीव विशेषज्ञ और वन सेवा के अधिकारी इस दौर में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ पहुंचे। सारंगढ़ के राजा और पूर्व मुख्यमंत्री नरेशचंद्र सिंह से मिले। वनों से घिरे इस जिले के कुछ उम्मीद थी। राजा साहब ने रियासत का नक्शा मंगाया। कुछ लकीरें खींच दी। भारत की पहली वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी जमीन पर तय हो गयी थी। 1972 में ही नोटिफिकेशन भी आ गया, और मध्यप्रदेश सरकार को एक लाख का इनाम भी। यही गोमर्डा अभयारण्य बना। जेजे दत्ता साहब जो बाद में, मध्यप्रदेश के पीसीसीएफ, वाइल्डलाइफ वार्डेन और देश के बड़े-बड़े राष्ट्रीय उद्यानों के प्रमुख बनने वाले थे, इस पहली सेंक्चुरी में जमीन पर उतरकर काम किया। टमटोरा का वह गेस्ट हाउस, वह मैना और मोर कक्ष, उनके दौर के बने है। असल मे उस हट का नाम जेजे दत्ता हट था। छत्तीसगढ़ बनने पर किसी अज्ञानी अहमक अफसर ने उसका नाम बदल दिया। --- इंदिरा की उस स्पीच के कोई 48 साल बाद, उससे उपजे अभ्यारण्य मैंने कुछ लम्हे गुजारे। मुझ जैसे लाखों लोग आज भारत के राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों में थोड़ा वक्त गुजारने की ख्वाहिश रखते है। अगणित जीव यहां मानवीय दखल से दूर कलरव करते हैं। अभय अरण्य में स्वच्छन्द, निर्भीक जीते हैं। क्या आप उस कलरव में बजते भारत के डंके को सुन पा रहे हैं। शायद नही, क्योकि आपकी टीवी का वॉल्यूम हाई है। जिसने आपको नहीं बताया कि हाल ही में पर्यावरणीय अनुमति के कानून ढीले कर दिए गए है। अब फैक्ट्रियां और खदानें वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में अतिक्रमण कर सकेंगे। तब उनका घर उजाड़ने वाले, ऊंची आवाज में, बेघर हो चुके बेजुबान जंगली जीवों से अवश्य पूछेंगे बताओ, सत्तर सालों में तुम्हारे लिए क्या किया गया...?
वायु प्रदूषण के चलते कोविड-19 मरीज़ों की मृत्यु दर में इजाफ़ा
वायु प्रदूषण - कोराना महामारी के लिए गंभीर खतरा, प्रशासन को सचेत होने की जरूरत है
स्त्री के साथ सोना ही नहीं जागना भी चाहिए
नाम कुछ भी हो सकता है कभी निर्भया, कभी मनीषा तो कुछ और। शहर भी कोई और हो सकता है।दिल्ली, हाथरस या बलरामपुर। रायगढ भी हो सकता है। यहां चन्द वर्षों पहले एक बच्ची के साथ ऐसा घट चुकी है और आज भी ऐसी घटनाएं जारी है। कानून में आए बदलाव के बाद भी बलात्कार जैसे घिनौने अपराध थम नहीं रहे हैं बल्कि बढते जा रहे हैं। 2019 की बात करें तो लगभग साढे चार लाख महिलाओं पर अपराध दर्ज हुए जो 2018 की तुलना मे सात प्रतिशत अधिक था।ऐसी स्थिति सोचने पर मजबूर करती है कि बेटी बचाओ बेटी पढाओ,कन्या भ्रूण हत्या पर लगाम कसने के बाद भी ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। स्त्री आज भी समाज मे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। बेशक आज मनीषा रेप केस मे उसे दलित बताकर उसे जातिगत रंग दे उसका राजनीतिकरण करने की कोशिश भी की जा रही है लेकिन स्त्री की,स्त्री के अलावा कोई दूसरी जाति होती ही नही। समाज को इसे समझने की जरूरत है। पहले बलात्कार कर उसे मार दिया जाता था कभी कभी पीडिता स्वयं आत्महत्या कर लेती थी लेकिन अब बलात्कार कर उसके साथ बर्बरतापूर्वक हिंसा करना किस बात को दर्शाता है? किस आदिम युग की ओर जा रहे हम?प्रशासन या न्यायपालिका इस तरह की घटनाओं पर क्या कर रही है? सैकडो प्रश्न खडे हो जाते हैं।प्रशासन या पुलिस इतनी कमजोर भी नहीं होती लेकिन कभी कभी राजनैतिक रसूख के आगे उन्हें भी बेबस होना पडता है। ग्रामीण क्षेत्रों मे ऐसी घटनाओं मे अक्सर पुलिस की भूमिका संदिग्ध सी होती है।इतना ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों मे तो ऐसे मामले दर्ज तक नहीं होते।          यह तो हुई कानून और प्रशासन की बात।अब जरा समाज की बात करें, उनके भी दायित्वों की बात करें।महज मोमबत्ती जलाकर या सोशल मीडिया पर हैशटैग चलाकर उसके लिए न्याय मांगने से घटना की गंभीरता बढ जरूर जाती है । प्रशासन पर एक दबाव बनता है पर क्या यही इसका हल है? समाजशास्त्रियों और बुद्धिजीवियों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।हिन्सा और क्रूरता का ग्राफ क्यों बढता जा रहा है? ऐसे अपराधियों की सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या होती होगी जिसके चलते वे ऐसी कच्ची उम्र मे अपराध के दलदल मे धँसते चले जाते हैं।अनेक सवाल खडे हो उठते हैं।        दरअसल स्त्री को लेकर एक संकीर्ण और सामंती मानसिकता सदियों से चली आ रही है जो आज भी बनी हुई है कि वह एक उपभोग की वस्तु है।इस मानसिकता के खिलाफ एक सामाजिक चेतना की जरूरत है जिसकी पहल स्त्री को ही करनी होगी और उसके साथ जागरूक पुरुषों को भी जुडना होगा।अब तक नारी पुनरूत्थान के जितने भी आन्दोलन हुए उनमें नेतृत्वकारी भूमिका पुरुषों की ही रही है।अब पुरूष समाज को यह चेतना लानी होगी और उन्हे परिवार मे स्त्री की जगह को फिर से परिभाषित करनी होगी।खासकर पारिवारिक मुद्दों पर उसे बराबरी का दर्जा देना होगा चाहे वह कामकाजी हो या गृहिणी तभी स्त्री को लेकर समाज मे बदलाव की अपेक्षा की जा सकती है।स्त्री को लेकर एक सडांध जो समाज मे गहरे तक जम चुकी है उसकी सफाई के लिए उन्हें ही आना होगा।स्त्री तो अपने वजूद की लडाई लडते हुए ही आज इस मुकाम तक पहुंची है।छिटपुट और सतही चल रहे स्त्री स्वातंत्र्य के आन्दोलन को गहरा धरातल और नई दिशा देनी होगी।परिवार और समाज मे उचित स्थान मिलने पर ही उसमें एक नैतिक मनोबल पूरे आत्मविश्वास से दमकेगा। कितनी अजीब बात है कि एक ओर हम कोऱोना जैसे महामारी से मुक्ति के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानो के माध्यम से वेक्सीन की तलाश मे जुटे है लेकिन दूसरी तरफ बलात्कार जैसे मानसिक विकृति के जीवाणु के लिए सामाजिक स्तर पर कोई भी वेक्सीन तलाशने मे असफल रहे।क्या आज भी हमारी मानसिकता सोलहवीं शताब्दी की गिरफ्त में है? (लेखिका वरिष्ठ शिक्षाविद और समाजसेवी हैं, लेख में उनके निजी विचार हैं)
अजय आठले को अन्तिम लाल सलाम
तुम्हारे सपने को मंज़िल तक पहुंचाएंगे। तुम नहीं रहे इसका गम तो है लेकिन लाल झंडा लेकर कामरेड आगे बढ़ते जाएंगे।
पर्यावरण और मीडिया
पर्यावरण आज पूरे विश्व की चिन्ता के केन्द्र में है। पूरी दुनिया मे जिस तरह पर्यावरण के संतुलन का क्षरण हो रहा है उसके परिणाम हमें तरह तरह की प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखने को मिल रहा है। ताजा उदाहरण विश्वव्यापी कोरोना है। बाढ़,अल्पवृष्टि, अतिवृष्टि, भूस्खलन तो छोटे लेकिन गंभीर उदाहरण हैं। दरअसल हमारा पर्यावरणीय परिवेश हवा, जल ,जंगल, जमीन, और जैवविविधता के आनुपातिक सामंजस्य से बना हुआ है। प्रकृति ने इसी सामंजस्य को बनाए रखा है वह मनुष्य को उसकी जरूरत का सब कुछ देती है लेकिन उसके लालच और स्वार्थ की पूर्ति नहीं कर पाती। दुख इस बात का है कि सब कुछ जानते हुए भी इसे समझ क्यों नहीं पाता। पर्यावरण मे यदि मीडिया के योगदान की बात करें तो पहले हमें मीडिया के चरित्र को समझना जरूरी है। यह जानी सी बात है कि पूरी दुनिया मे कथित मुख्य की मीडिया उन्हीं कॉरपोरेट घरानों की गोद मे बैठी है जो सबसे ज्यादा पर्यावरण को क्षति पहुंचाते हैं। विकास के नाम पर अन्धाधुन्ध औद्योगिकरण के लिए जिस तरह जंगलों को नष्ट किया गया उसका असर जैवविविधता पर स्वाभाविक रुप से पड़ा। नतीजे में पृथ्वी का पारिस्थितिकी संतुलन इस हद तक बिगड़ा कि ओजोन परत तक उसका प्रतिकूल प्रभाव देखा जा सकता है। इस स्थिति को लेकर मीडिया एक अहम भूमिका निभा सकती थी और अभी भी निभा सकती है लेकिन मुख्यधारा की मीडिया की प्राथमिकताओं मे पर्यावरण का क्रम बहुत नीचे है। बावजूद इसके मीडिया का एक ऐसा हिस्सा भी है जो जिले और आन्चलिक स्तरों मे प्रकाशित होते हैं। मीडिया का यह हिस्सा पर्यावरण को लेकर सजग रहा है और पर्यावरण संरक्षण की दिशा मे होने वाले छोटे-छोटे प्रयासों को प्रमुखता से प्रकाशित कर आमजन को जागरूक करने की सजग भूमिका निभा रहा है। अब तो इन मायनों में सोशल मीडिया की भी काफी अहम भूमिका होती जा रही है। सोशल मीडिया में भी बिगड़ते पर्यावरण को लेकर चर्चाओं के माध्यम से चिन्ता व्यक्त की जा रही है। यहां यह बताना होगा कि खासतौर पर भारत के गांवों मे रहने वाले लोग अपनी सहज जीवनशैली मे भी पर्यावरण को लेकर जीतने सहज रहते हैं शहर के लोगो मे यह सहजता नहीं पाई जाती। उल्टे पर्यावरण को लेकर उनमें एक आत्मघाती लापरवाही होती है। इस संन्दर्भ मे यदि अपने ही शहर की बात करें तो पिछले दिनों लगातार वन्यजीव और जलचरों की हत्या का मामला सुर्खियों मे रहा। अवैध कटाई के मामले भी खबर बनी। ये सब पर्यावरणीय दृष्टि से घातक हैं और इंसान के लालच को दर्शाते भी हैं। अन्चल के पत्रकारों ने इसे छापा भी और फौरी तौर पर कार्यवाही भी हुई लेकिन क्या इसके पुनरावृत्ति होने की संभावना नही है? इसपर गंभीरता से विचार कर ठोस कार्यवाही हेतु कड़े कदम उठाने और निर्णय लेने की आवश्यकता है। निष्कर्ष यह कि ऐसा नहीं कि मीडिया इन मुद्दों पर मौन है लेकिन इस विषय पर उसे और मुखर होने की जरूरत है। बेशक टीआरपी और न्यूज वेल्यू के उनके अपने बंधन होते है। फिर भी जनहित के मुद्दों को लेकर वह जवाबदेही से अपना पल्ला झाड नहीं सकते। अमूमन यह देखा जाता है कि बड़े-बड़े अखबार के मुखपृष्ठ विज्ञापन के होर्डिंग बन चुके हैं जिसे मीडिया की भाषा मे जैकेट कहा जाता है। राजनीति से जुड़ी छोटी से छोटी खबर उनकी प्राथमिकता में शीर्ष पर होती है और पर्यावरण जैसे अहम मुद्दे गौण। इसे मीडिया ही नहीं आमजन को भी समझना होगा खासतौर पर शिक्षित वर्ग को। उनसे यह अपेक्षा तो की जा सकती है कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए इसके संरक्षण और संवर्धन के उपायों पर न केवल सोचना शुरू करें बल्कि वास्तव मे कुछ करें भी क्योंकि यह महज एक शहर,एक देश की नहीं बल्कि पूरे विश्व और मानवजाति की समस्या. बन चुकी है। (लेखिका सांध्य दैनिक समाचार पत्र बयार की प्रबंध संपादक,शिक्षाविद और पर्यावरण संरक्षण समिति की जिला प्रमुख हैं। )
कलेक्टर भीम सिंह ने भारी बारिश के बीच संभाला मोर्चा, देखें तस्वीरें
निगम अमला बीती रात से आयुक्त के साथ पूरे शहर में डटा हुआ है
तस्वीरों में देखें रायगढ़ में जनता कर्फ्यू का असर
22 मार्च यानी रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर जिले में भी जनता कर्फ्यू का असर देखने को मिला। दोपहर तक पूरा शहर स्वस्फूर्त बंद था। हर मुख्य मार्ग और बाजार बंद मिले। गली-कूचे तक कोई व्यक्ति बाहर नहीं निकला।
हरि बोल, जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ निकली रथयात्रा, देखें गैलरी
रायगढ़ में दो दिनों की रथयात्रा आयोजित होती रही है। इसी क्रम में आज रथ द्वितिया के दिन शहर के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर से भगवान श्री को विधिविधान पूर्वक पूजा अर्चना पश्चात मंदिर के गर्भगृह तथा मंदिर परिसर से जय जगन्नाथ के जयघोष और घंट शंख ध्वनि के बीच ससम्मान बाहर निकाला गया। राजापारा स्थित प्रांगढ़ में मेले सा माहौल था और हजारो की संख्या में श्रद्धालु भक्तगण भगवान श्री के दर्शन करने के लिए पहुंचे हुए थे। इससे पहले कल भगवान जगन्नाथ की विधि विधान से पूजा की गई जिसे फोटोग्राफर वेदव्यास गुप्ता ने अपने कैमरे में कैद किया।
इप्टा रायगढ़ के 25वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की झलकियां
27 से 31 जनवरी तक पॉलिटेक्निक ऑडिटोरिम में इप्टा रायगढ़ द्वारा 25वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। जिसमें चार नाटक एवं दो फीचर फिल्में दिखाई गईं। समारोह की शुरुआत रायपुर के मशहूर रंगकर्मी मिर्जा मसूद को 10वां शरदचंद्र वैरागकर अवार्ड देकर की गई। यह कूवत सिर्फ रंगमंच रखता है जो वर्तमान सत्ता के मठाधीशों पर अजब मदारी गजब तमाशा नाटक के माध्यम से सीधे कटाक्ष कर सकता है। जहां एक मदारी को राजा बना दिया जाता है, शब्दों के अस्तित्व को खत्म कर दिया जाता है। बंदर राष्ट्रीय पशु बन जाता है। गांधी चौक नाटक में गांधीजी की प्रतिमा स्वयं यह चलकर वहां से हट जाती है कि जब रक्षक की भक्षक बन गए तो कोई क्या कर सकता है। नोटबंदी और जीएसटी पर गांव वाले सीधे प्रहार करते हैं। सुबह होने वाली है की लेखी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध होने के बाद लोगों को जागरूक करने को किताब लिखती और किताब को ही फांसी हो जाती है। बोल की लब आजाद हैं तेरे लोगों को दर्शकदीर्घा में झकघोर के रख देती है। तुरूप और भूलन जैसी फिल्में लोगों के मनोरंजन के अलावा दमदार संदेश भी देती है। तो देखें इस शानदार नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की कुछ झलकियां
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