सुनील रामदास : व्यापार विरासत में नहीं मिला, पिता के संस्कार मिले
59 वर्षीय सुनील रामदास अग्रवाल एक सफल उद्योगपति होने के साथ-साथ समाजसेवा का पर्याय माने जाते हैं। लेकिन उनकी कहानी किसी बड़े कारोबारी घराने से शुरू नहीं होती। यह कहानी शुरू होती है खरसिया के एक साधारण परिवार से, जहां उनके पिता रामदास अग्रवाल ने संघर्ष, मेहनत और ईमानदारी की पूंजी से अपने परिवार और व्यवसाय की नींव रखी।
खरसिया से शुरू हुआ सफर सारंगढ़ पहुंचा, फिर पत्थलगांव तक गया। चूड़ियों के छोटे से कारोबार के बीच रामदास अग्रवाल अपने तीनों बेटों—सुनील, अनिल और सुशील—को साथ बैठाकर व्यापार की बारीकियां सिखाते थे। उनके लिए कारोबार केवल कमाई का जरिया नहीं था, बल्कि जीवन जीने की एक पाठशाला थी।
वर्ष 2002 में सुनील अग्रवाल पत्थलगांव से रायगढ़ आए और ठेकेदारी का काम शुरू किया। मेहनत, दूरदृष्टि और जोखिम उठाने के साहस ने उन्हें जल्द ही छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र के बड़े ठेकेदारों की कतार में ला खड़ा किया। इसके बाद उन्होंने एसकेए ग्रुप की स्थापना कि जिसमें रायगढ़ और रायपुर में स्टील एंड पावर उद्योग और कंस्ट्रक्शन की 4 कंपनी है। लेकिन सफलता के इस शिखर पर पहुंचने के बाद भी वे अपनी जड़ों को नहीं भूले।
अपने माता-पिता की शादी की 50वीं वर्षगांठ पर उन्होंने रामदास-द्रौपदी फाउंडेशन की स्थापना की। इस फाउंडेशन के माध्यम से वे वर्षों से समाजसेवा के अनेक कार्य कर रहे हैं। इनमें हर वर्ष लगभग 50 हजार पौधे लगाने का अभियान प्रमुख है। पिछले 11 वर्षों से यह अभियान लगातार जारी है।
सुनील अग्रवाल कहते हैं, "हमारे पिता स्वभाव से कड़क थे। वे हमें डांटते भी थे और अनुशासन में रखते थे, ताकि हम व्यापार को अच्छी तरह समझ सकें। लेकिन उनके कठोर व्यक्तित्व के भीतर एक बेहद संवेदनशील और समाजसेवी इंसान छिपा था। उन्हें हमेशा सर्वसमाज की चिंता रहती थी।"
वे बताते हैं कि जब भी व्यापार में नुकसान होता, पिता डांटने के बजाय समझाते थे—"घबराना मत, यह नुकसान नहीं, आने वाले समय की सीख है। लेकिन व्यापार कभी मत छोड़ना। ईमानदार रहना, समय का पाबंद रहना और लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना।"
रामदास अग्रवाल को इस दुनिया से गए छह वर्ष हो चुके हैं, लेकिन सुनील कहते हैं कि आज भी उन्हें ऐसा लगता है मानो पिता उनके आसपास ही हों। सुबह भगवान की पूजा करने से पहले मैं पिताजी को प्रणाम करता हूं। मेरे लिए वही भगवान हैं। उनकी तस्वीर के सामने खड़े होकर उनसे बात करता हूं, उनसे क्षमा मांगता हूं और अपने हर फैसले की जानकारी देता हूं। मुझे लगता है कि वे आज भी मुझे देख रहे हैं। जहां भी होंगे, हमें देखकर खुश होते होंगे कि उनके दिए संस्कार आज भी हमारे जीवन का मार्गदर्शन कर रहे हैं।"
सुनील अग्रवाल कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता की सीख अपनी बेटी सेजल और बेटों अभिषेक व अभिनव को देने का प्रयास किया है। उनके अनुसार तीसरी पीढ़ी भी आज रामदास अग्रवाल के बताए रास्ते पर चल रही है।
वे भावुक होकर कहते हैं, "हमें अपने पिता से इतना लगाव है कि हम तीनों भाइयों ने अपने नाम के आगे स्वयं अपने पिता का नाम जोड़ लिया। क्योंकि समाज में जो सम्मान और विश्वास रामदास जी ने कमाया था, वही आज हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। जहां भी जाते हैं, लोग हमें हमारे नाम से कम और रामदास जी के बेटों के रूप में ज्यादा जानते हैं। यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी कमाई है।"
अपने बच्चों की परवरिश को लेकर वे कहते हैं कि समय बदल गया है। "हमारे समय में पिता की डांट ही सबसे बड़ी सीख होती थी। आज बच्चों को प्यार और दोस्ताना व्यवहार से समझाना पड़ता है। मैंने भी अपने बच्चों को दोस्त की तरह पाला है। लेकिन बाबूजी की एक सीख आज भी उन्हें देता हूं—दूसरे के दुख को अपना दुख समझो, जरूरतमंद की मदद के लिए हमेशा आगे बढ़ो और कर्म को सबसे ऊपर रखो।"
उनका मानना है कि धन कमाने की इच्छा हर व्यक्ति में होती है, लेकिन अंत में पहचान धन से नहीं, कर्म और संस्कारों से बनती है। यही विरासत उन्हें अपने पिता से मिली और यही विरासत वे आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं।
मनरंजन