राष्ट्र के निर्माता: कल, आज और कल के रायगढ़ के इंजीनियर
देश में हर वर्ष 15 सितम्बर को अभियंता दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत रत्न मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है, जिन्होंने अपने अद्वितीय कौशल और दृष्टिकोण से राष्ट्र के औद्योगिक और तकनीकी विकास को नई दिशा दी। अभियंता केवल मशीनों और संरचनाओं के निर्माता ही नहीं, बल्कि समाज की प्रगति के आधार स्तंभ हैं। पुल, सड़क, ऊर्जा, सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवाएँ और अंतरिक्ष अनुसंधान हर क्षेत्र में उनकी मेहनत और रचनात्मकता झलकती है।
पिछले वर्षों में भारत और रायगढ़ जिले ने भी ने औद्योगिक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और हरित ऊर्जा जैसी पहलों ने इंजीनियरों को बेहतर गुणवत्ता का उत्पादन और नवीन समाधान प्रस्तुत करने का अवसर दिया है। आज भारत वैश्विक स्तर पर मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में उभरती हुई शक्ति है। अभियंता दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि अभियंताओं की दूरदृष्टि और परिश्रम ही आधुनिक भारत के निर्माण की सच्ची नींव है। आज के इस विशेष लेख में हम अपने अंचल के कुछ इंजीनियर्स से हुई बातें साझा करेंगे,
qqq
<b>समस्या कितनी बड़ी क्यों न हो समाधान अवश्य होता है : अनिल कुमार, ईडी एनटीपीसी लारा</b>
रायगढ़ छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जाना जाता है जो विकास से राह पर रायगढ़ तेजी से विकास कर रहा है। एनटीपीसी जैसे देश का सबसे बड़े विद्युत कंपनी का सयंत्र लारा में स्थापित है जो छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा पावर प्लांट बनने की ओर अग्रसर है। पावर प्लांट जैसे बड़े उद्योग में लगभग 95 प्रतिशत इंजीनियर होते है। आज इंजीनियर डे पर एनटीपीसी लारा के परियोजना प्रमुख अनिल कुमार, कार्यकारी निदेशक ने सभी को आज के दिवस की बधाई दी है।
वह कहते हैं कि इंजीनियर का दिमाग समस्याओं को हल करने के व्यावहारिक तरीके ढूंढता है, जबकि आम इंसान का दृष्टिकोण अक्सर सीधा और सरल होता है। दोनों दृष्टिकोणों का संतुलन किसी भी संस्था को संतुलित और व्यवहारिक दिशा देता है। समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसका समाधान अवश्य होता है। इसी सोच को मैंने अपने जीवन और कार्य में आत्मसात किया है और यही मुझे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
आने वाले वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन इंजीनियरिंग क्षेत्र इस विद्या को नई ऊंचाइयों की ओर ले जाएगा। जहां एक ओर ये तकनीकें काम को आसान और तेज़ बनाएंगी, वहीं दूसरी ओर इंजीनियरों के लिए नए कौशल और ज्ञान हासिल करना अनिवार्य हो जाएगा।
अनिल कुमार का मानना है कि इंजीनियरिंग शिक्षा केवल मशीनों को समझना नहीं बल्कि समस्याओं को हल करने की क्षमता विकसित करना है। यही दृष्टिकोण आज उनकी जिम्मेदारियों को निभाने में मदद करता है-चाहे वह परियोजना प्रबंधन हो, टीम नेतृत्व हो या नई तकनीक को अपनाना है।
जैसे कहावत है इंजीनिरिंग एक सदा बहार क्षेत्र है, यह सही है। इस क्षेत्र में जीवन भर आपको सीखने को मिलेगा, चुनौतियों से घबराना नहीं और हमेशा नैतिक मूल्यों के साथ काम करना है।
आज भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई का महत्व कम नहीं हुआ है। बदलते समय में इंजीनियरिंग का स्वरूप जरूर बदला है, परंतु यह अब भी समाज और देश के विकास का सबसे मजबूत स्तंभ है। आधुनिक समाज में इंजीनिरिंग की पढ़ाई सिर्फ नौकरी करने तक सीमित नहीं रह गया है। आर्थिक उदारीकरण और ग्लोबालाइगेशन की दौर में इंजीनिरिंग पढ़ाई के बाद आपके लिए कई क्षेत्र में अवसर खुल जाते है। जिसके बदौलत नौकरी नहीं तो खुद का सयंत्र, व्यवसाय आदि किया जा सकता है।
अनिल कुमार का मानना है कि सीखने और करने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। परिवर्तन संसार का नियम है और इंजीनियरिंग क्षेत्र ऐसा कार्य है जिसमे हमेशा नवाचार की गुंजाइश बनी रहती है और इस पर हमे कार्य करना है। श्री अनिल कुमार जी एक इंजीनियर होने के साथ साथ संगीत में उनका गहरा रुचि है। साथ ही घूमने के शौकीन है। अक्सर वे पश्चात संगीत एवं परिवार के साथ घूमने को ज्यादा महत्व देते हैं।
सामान्य परिवार में जन्मे अनिल कुमार की प्रारंभिक शिक्षा ग्राम के सरकारी स्कूल से हुई। विज्ञान विषयों में गहरी रुचि ने उन्हें इंजीनियरिंग की ओर प्रेरित किया। आगे चलकर उन्होंने उत्तर प्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। 1987 में प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से उन्हें एनटीपीसी में नौकरी मिली।
विदित को कि साल 1985 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई काफी कठिन माना जाता था। इंजीनियरिंग कॉलेज बहुत कम थे जो थे वहांपरिवहन व्यवस्था भी सीमित हुआ करती थी इसीलिए इंजीनियरिंग पढ़ाई करने के लिए बड़े शहर में जाना पड़ता था। जिससे बहुत कम बच्चे इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए आगे आते थे। इस प्रकार के सीमित संसाधनों और कठिन प्रतिस्पर्धा के बावजूद अनिल कुमार ने अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखा। पारिवारिक सहयोग और आत्मविश्वास ने उन्हें हर कठिनाई से उबारने में मदद की।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई की यादगार घटना पर अनिल कुमार बताते हैं कि उस दौरान टीमवर्क और नवाचार की भावना उनके जीवन में गहराई से बसी। बड़े इंजीनियरिंग कार्य में टीम वर्क के साथ अलग-अलग कार्य को सम्पादन करने के लिए टीमों के बीच समन्वय होना भी समय पर कार्य सम्पादन के लिए बहुत जरूरी होता है। जैसे कहावत है "हर एक फ्रेंड जरूरी है" इंजीनियरिंग में टीम वर्क विशेष होता है। एक कठिन चुनौतीपूर्ण कार्य को आसानी से किया जा सकता है। इंजीनियरिंग केवल तकनीकी ज्ञान नहीं बल्कि सामूहिक प्रयास और व्यावहारिक सोच का भी नाम है।
qqq
<b>कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं : एसई गुंजन शर्मा</b>
46 साल के गुंजन शर्मा छग राज्य बिजली वितरण कंपनी लिमिटेड में अधीक्षण यंत्री हैं। दुर्ग जिले में प्रारंभिक शिक्षा लेकर दुर्ग के ही भिलाई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलाजी से 2001 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बने। शुरुआती चार साल एनआईटी रायपुर और शंकराचार्य इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन का कार्य किया फिर 2004 में स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की परीक्षा पास करके सहायक अभियंता बने। 2013 में रायगढ़ में उनकी पोस्टिंग एई के रूप में हुई आज वह अपने अथक परिश्रम के बूते एसई हैं।
अधीक्षण यंत्री गुंजन शर्मा बताते हैं कि कठिन परिश्रम का कोई विकल्प नहीं होता। जब मैं स्कूल में था तब सोचा था इंजीनियर बनूंगा और जब इंजीनियरिंग कर रहा था तब ठान लिया था कि बिजली विभाग में नौकरी करूंगा। इलेक्ट्रिकल इंजीनियर होने के नाते 46 साल की उम्र में मैं राज्य बिजली वितरण विभाग का अधीक्षण यंत्री हूं। मैं यही चाहता था पर इस चाहत के पीछे मैंने हर समय अथाह और कठोर परिश्रम किया। हर जगह सिर्फ मेहनत किया। लोवर मिडिल क्लास से आता हूं पिता शिक्षक थे और उन्होंने मुझे इंजीनियर बनाया और आज उनके और अपने सपने को जी रहा हूं। मेहनत आज भी जारी है पद से घमंड सर कभी नहीं चढ़ा ।
उन्होंने कहा यदि इंजीनियर बनना है तो पहले यह जांचे की आप सक्षम हैं या नहीं। आजकल इंजीनियरिंग की डिग्री आसानी से मिल जा रही है पर दक्ष इंजीनियर मिलना बहुत मुश्किल हो गया है। फिर आप जिस इंजीनियरिंग कॉलेज में जा रहे हैं यह भी देखें कि वहां की सलेक्शन प्रक्रिया क्या है। बच्चे क्वालिटी एजुकेशन पर ध्यान दें। भीड़ का हिस्सा बनने से बचे। सीखने का जो अवसर मिले उसे सीखें। आज नहीं तो कल यह सीख आपके काम आएगी। सीखने की ललक हमेशा बनी रहनी चाहिए तभी आपका मार्ग प्रशस्त रहेगा। क्योंकि पहले की तुलना में अभी कॉम्पटिशन अधिक बढ़ गया है और इसमें सरवाईव करने के लिए आपको हर फन आना ही होगा अन्यथा आप पीछे छूट जाएंगे।
गुंजन आगे बताते हैं कि समय के साथ बिजली विभाग में बहुत परिवर्तन आया है। उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ी तो उसी अनुपात में सब स्टेशन और फीडर बनाए गए। ऑटोमेशन के कारण अब बिजली बिल घर-घर जाकर बनाया जा रहा है। शिकायत से लेकर बिल भुगतान ऑनलाइन हो रहे हैं। बिजली मीटर स्मार्ट हो गए हैं। कम समय में बिजली बाधा को दूर कर लिया जा रहा है। पहले की तुलना में बिजली विभाग ज्यादा सशक्त हो गया है। जब प्राकृतिक आपदा आती है तो उस समय कुछ स्थलों पर समय लगता है क्योंकि इस आपदा की हानि का आंकलन हम नहीं कर सकते फिर भी कोशिश रहती है कि जल्द से जल्द बिजली बहाल कर सकें।
अंत में उन्होंने कहा कि इंजीनियरिंग में जो सीखा वह ताउम्र याद रहेगा। आज हमारे काम में 20 फीसदी तकनीक तो 80 फीसदी मैनेजेरियल कौशल की जरूरत पड़ती है इसे मैंने इंजीनियरिंग कॉलेज से ही सीखा है। अपने मातहतों के साथ दोस्ताना और गाइड की भूमिका में रहता हूं। सीनियर्स से भी मार्गदर्शन लेता रहता हूं क्योंकि आज जहां मैं हूं कल वहां वो थे तो। नॉन टेक्निकल ऑफिस स्टाफ भी हमारी पूरी मदद करता है। उनके पास अनुभव है। सभी के सहयोग से आगे बढ़ रहा हूं।
qqq
<b>इंजीनियरिंग ने मुझे पढ़ना, सीखना और जीना सिखाया : बृजेश सिंह क्षत्रिय, निगम आयुक्त</b>
जिले में प्रशासनिक सेवाओं में भी इंजीनियरिंग किए हुए अधिकारी मौजूद हैं इनमें से एक हैं रायगढ़ नगर निगम आयुक्त बृजेश सिंह क्षत्रिय। बिलासपुर कोटा के रहने वाले श्री क्षत्रिय ने शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज बिलासपुर के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड टेलीकम्युनेशन ब्रांच से 2011 में इंजीनियरिंग की। 2012 पीएससी के माध्यम से राज्य प्रशासनिक सेवा में 2015 में कमीशन्ड हुए। नवंबर 2024 से वे जिले में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
शहर को स्वच्छ रखना उनकी प्राथमिकता है। इसलिए वह सुबह 6 बजे से 10 बजे तक खुद अपनी निगम की टीम के साथ कार्य करते हैं। परिणाम स्वरूप इस बार बरसात में सड़क पर पानी कम आ रहा। अरसे से संजय कॉम्पेक्स के नाले की सफाई नहीं हुई थी। मिशन मोड में इन्होंने नाले के साथ-साथ नालियों की सफाई और अतिक्रमण भी हटाया वह भी बिना विवाद के। सफाई के कारण ही इस बार रायगढ़ में डेंगू के बहुत कम मामले आए हैं। स्वच्छता रैंकिंग में रायगढ़ निगम ने अच्छा प्रदर्शन किया है। आयुक्त क्षत्रिय के प्रयासों के कारण ही पहली बार केलो नदी की सफाई हुई। 5 पोकलेन मशीनों ने 7 दिन में केलो का उसका खोया गौरव वापस लौटाया। कम समय में शहर की मुख्य 27 सड़कों का निर्माण भी इनकी निगरानी में हुई। सिग्नल चौक के पास नया गार्डन विकसित करना या फिर केलो नदी पर बने पुल पर जाली लगाकर केलो को प्रदूषित होने से रोकना। केलो पुल पर लाइटिंग और नया फुटपाथ बनाना इनकी ही योजनाओं में से एक है।
निगम आयुक्त बृजेश सिंह क्षत्रिय बताते हैं कि इंजीनियर होने के नाते काम करने में आसानी होती है। होमवर्क से काम में गुणवत्ता और टिकाऊपन आता है। कोई तकनीकी जानकारी या फिर इंजीनियरिंग मशीनरी नहीं छूटती। मेरी शिक्षा ने मुझे जो ज्ञान दिया है वह हर दिन हर समय मेरे कार्य में सहयोग करती है।
उन्होंने बताया कि कार्य क्षेत्र में समस्याएं आती हैं और आती रहेंगी मैं उनके हल करने की दिशा में कार्य करता हूं। टालना कभी नहीं सीखा। जो हो सकता है उस पर ऊर्जा लगाता हूं l मेरे काम में मेरी इंजीनियरिंग का बहुत बड़ा योगदान है। इंजीनियरिंग से मैंने पढ़ना और जीना सीखा है। वह हमें भविष्य के लिए तैयार करती है। 4 साल में हम इतने मंझ जाते हैं कि कोई भी काम हो हम उसे करने से कतराते नहीं है उसे अंजाम तक पहुंचा ही देते हैं यह हमें जीवट बनाती है।
वर्तमान में इंजीनियरिंग के बारे में वह कहते हैं कि समय के साथ इंजीनियरिंग आसान तो होती जा रही है पर चुनौती यहां भावी इंजीनियर्स के फोकस्ड रहने की है। सोशल और डिजिटल की चंगुल में फंसे युवा को अभी पढ़ाई की ओर मोड़ना बड़ा कार्य है। अगर आपका इंजीनियरिंग में रूझान है और किस विषय में तभी आईये। यह आपकी जिंदगी बदल देगी पर सिर्फ कोर्स के नाम पर आएंगे तो भीड़ में आप खो जाएंगे। सीखने की ललक है तो ही पढ़े। पहले कहा जाता था मेहनत से सब होगा पर अब जब आर्टिफिशियल इंजीनियरिंग, ऑटोमेशन की पहुंच बच्चे-बच्चे तक है ऐसे में आपको मेहनत के साथ दक्षता भी हासिल करनी होगी।
qqq
<b>एआई और ऑटोमेशन से बदल गया इंजीनियरिंग का स्वरूप : शिक्षाविद् पूनम द्विवेदी</b>
यदि आप निपुण और दक्ष हैं तो आपके लिए शहर या फिर राज्य का बंधन नहीं होता आपकी काबिलियत के अनुसार कार्य आपको मिल ही जाता है। यह कहना है 35 वर्षीय शिक्षाविद् पूनम द्विवेदी का जो फिलहाल रायगढ़ के ओपी जिंदल स्कूल में कंप्यूटर टीचर के साथ ही साथ वहां के सॉफ्टवेयर का भी कार्य करती हैं। पूनम रायगढ़ से ही हैं, प्रारंभिक शिक्षा कार्मेल स्कूल से लेने का बाद किरोड़ीमल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी से 2011 में आईटी ब्रांच से इंजीनियरिंग की। फिर हैदराबाद में ओरेकल सर्टिफाइड जावा प्रोग्रामर बनने के बाद आईटी फर्म में नौकरी मिली पर पारिवारिक कारणों से वापस रायगढ़ आ गईं। फिर यहां पूनम ने ओपी जिंदल स्कूल में बतौर कंप्यूटर शिक्षक सेवाएं देना शुरू किया। इसी बीच भोपाल से राजीव गांधी प्रौद्योगिकी संस्थान इंजीनियरिंग में मास्टर्स भी किया।
एमटेक और स्कूल इस पर अमूमन लोग कंफ्यूज हो जाते हैं कि इस डिग्री का यहां क्या काम। पर पूनम बताती हैं कि उनका ओपी जिंदल स्कूल इतना बड़ा है कि कंप्यूटर डिपार्मेंट में आईटी प्रोफेशनल और स्पेशलिस्ट की बड़ी टीम हैं और सभी पर करीब 7000 छात्र ,स्टाफ के डेटा बेस और सॉफ्टवेयर को संभालने की जिम्मेदारी होती है। लगभग सारे रिसोर्सेस मौजूद हैं। सॉफ्टवेयर जो अन्य स्कूल खरीदते हैं वह उनका डिपार्मेंट खुद बनाता है। इस डिपार्मेंट पर बच्चों को कंप्यूटर की बेसिक शिक्षा से लेकर एडवांस, एप्लीकेशन और कंप्यूटर लैंगुएज सिखाने की जिम्मेदारी भी है।
बकौल पूनम बड़े शहरों में आईटी कंपनी में बेसिक कंप्यूटर लैंग्वेज के आधार पर जो लोग कार्य करते हैं उससे ज्यादा दक्षता और ज्ञान वाले लोग हमारे यहां हैं। जरूरी नहीं है कि सारे इंजीनियर मल्टीनेशनल कंपनी और आईटी फर्म में नौकरी करें। उनकी जरूरत बड़े संस्थानों में भी होती है इसलिए जिसमें दक्षता है उसके लिए शहर मायने नहीं रखता। ऑटोमेशन पुराना है पर प्रभावकारी है। इसके बाद आए लॉन्ग लैंगुएज मॉड्यूल यानि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) ने अब इंजीनियरिंग ही नहीं आम जीवन को भी बहुत प्रभावित किया है। एक्चुअल और आर्टिफिशियल में अब अंतर करना मुश्किल हो गया है। बच्चों के पाठ्यक्रम में एआई को शामिल कर उन्हें इसके बारे में समझाया जा रहा है।
पूनम कहती हैं कि नित नए एप्लीकेशन या फिर फोटो, घिबली, गाने जो सोशल मीडिया में हिट हो रहे हैं वह एआई की ही देन है। इस समय बच्चों के साथ पालकों को और अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। आपको अपने बच्चे के भविष्य की पढ़ाई के निर्णय को अब काफी पहले लेना पड़ रहा हैं क्योंकि कंपीटिशन के इस दौर में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। शिक्षा आसान हुई है, टूल कई सारे आ गए हैं पर फोकस अभी के छात्रों में कम है। उनके पास मनोरंजन के काफी साधन है और कई बच्चे इसी में अटक के रह जा रहे हैं। ज्यादातर पालक बच्चों को इसी में खुश देख खुद खुश हो जा रहे हैं , यह सही प्रैक्टिस नहीं है। डिजिटल युग में हमारी सतर्कता ही हमें सुरक्षित रखती है फिर क्षेत्र कोई सा भी हो।