raigarh express

Raigarh Express, news of raigarh chhattisgarh

Wednesday, August 19, 2026
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अमित उर्फ पुष्पेंद्र गोयल की अग्रिम जमानत खारिज, अब विदेश भागने की फिराक में
नाबालिग भांजी से चार साल तक दुष्कर्म के आरोप में घिरा पुष्पेंद्र गोयल, पिता-पत्नी के बैंक खातों से लगातार बड़ी रकम निकासी का दावा
आसपास
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फाइल में ना, मैदान में मीना बाजार! किसके दम पर खड़ा हुआ पूरा मेला?
हमारे बच्चे
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रिश्ते की आड़ में भरोसा टूटा, POCSO में मामला दर्ज; पखवाड़े बाद भी आरोपी मामा पुलिस की पकड़ से बाहर
आसपास
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सुशासन तिहार के नाम पर साय सरकार का छलावा: तारेन्द्र डनसेना
राजनीति
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कांग्रेस के लिए कुछ लड़ रहे, बाकी अपने लिए लड़ने की तैयारी में
राजनीति
अमित उर्फ पुष्पेंद्र गोयल की अग्रिम जमानत खारिज, अब विदेश भागने की फिराक में
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रिश्ते की आड़ में भरोसा टूटा, POCSO में मामला दर्ज; पखवाड़े बाद भी आरोपी मामा पुलिस की पकड़ से बाहर
गिरफ्तारी के बाद हो सकते हैं और भी चौंकाने वाले खुलासे
इस्कॉन प्रचार केंद्र रायगढ़ ने निकाली भगवान जगन्नाथ की भव्य रथयात्रा
हरिनाम संकीर्तन से भक्तिमय हुआ रायगढ़, 10 अवतार में होगा भगवान का श्रृंगार
रायगढ़ में बिजली की मांग दोगुनी, व्यवस्था पर बढ़ता संकट
जुलाई की शुरुआत में ही 60 मेगावाट पहुंची मांग, दिवाली नहीं अब गर्मी बन रही पीक सीजन
सुशासन तिहार के नाम पर साय सरकार का छलावा: तारेन्द्र डनसेना
खरसिया की स्वीकृत सड़कें बजट से विलोपित होने का कांग्रेस का आरोप
कांग्रेस के लिए कुछ लड़ रहे, बाकी अपने लिए लड़ने की तैयारी में
दावेदारी की दौड़: जमीन पर कार्यकर्ता नहीं, नेताओं के दरबार में हाजिरी पूरी
भाजपा का सबसे बड़ा विपक्ष अब भाजपा ही है
अफसरशाही, जनसुनवाई विवाद,आयातित नेतृत्व और नाराज़ कार्यकर्ता—क्या भाजपा अपनी सबसे बड़ी चुनौती को पहचान पाएगी
रवि भगत : भाजपा का भविष्य क्यों बन रहा भाजपा के लिए चुनौती?
रवि के बढ़ते कद से कौन डरा , जहां समझाईश से बात बन सकती थी तो मामले को क्यों बड़ा बनाया?
नाली पर गिट्टी-बालू रखने से हुआ जलभराव, निगम की कड़ी कार्रवाई
संस्कार फ्लेक्स पर ₹20,000 का जुर्माना, गिट्टी-बालू जप्त , अब स्थिति सामान्य
चक्रधर नगर पोल्ट्री फार्म में मिला बर्ड फ्लू का केस
कलेक्टर ने देर रात अधिकारियों की आपातकालीन बैठक लेकर स्थिति नियंत्रित करने बनाई रणनीति
किसी भी आपात स्थिति से निबटने स्वास्थ्य अमला पूरी तरह से तैयार: सीएमएचओ डॉ. केशरी
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन का स्वास्थ्य सेवाएँ पहुंचाने पर जोर*
रायगढ़ में मूसलाधार बारिश की संभावना
बारिश से महानदी में बढ़ा जलस्तर, रायगढ़ जिला प्रशासन अलर्ट
फाइल में ना, मैदान में मीना बाजार! किसके दम पर खड़ा हुआ पूरा मेला?
मीना बाजार और प्रशासन का प्रेम कोई नया नहीं, हाई कोर्ट के आदेश के दौर में भी लग चुका है पूरा मेला
मीना बाजार: सवाल पुराने, शिकायतें पुरानी, फिर भी हर साल लग जाता है मेला
मनमाना बाजार के सामने सब हो जाते हैं नतमस्तक
व्यापार से पहले संस्कार: पिता के आदर्शों पर खड़ा है एनआर परिवार
सफलता की कहानियां अक्सर संघर्ष, मेहनत और दूरदर्शिता से लिखी जाती हैं, लेकिन कुछ कहानियां ऐसी भी होती हैं जिनकी नींव पिता के संस्कारों पर टिकी होती है। एनआर ग्रुप के संस्थापक 53 वर्षीय संजय अग्रवाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वे अपनी हर उपलब्धि का श्रेय अपने पिता नंदकिशोर अग्रवाल की सीख, मार्गदर्शन और मूल्यों को देते हैं। संजय अग्रवाल ने वर्ष 2007 में अपने पिता के नाम के अक्षरों पर आधारित एनआर ग्रुप की स्थापना की। आज यह समूह चार सफल उद्योगों का संचालन कर रहा है और लगभग 8 हजार लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। लेकिन संजय मानते हैं कि उनकी सबसे बड़ी पूंजी उद्योग नहीं, बल्कि पिता से मिली जीवन-दृष्टि है। वे बताते हैं कि समाजसेवा का संस्कार उन्हें विरासत में मिला है। उनके 86 वर्षीय पिता आज भी प्रतिदिन अस्पताल पहुंचकर करीब 125 जरूरतमंदों को अपने हाथों से भोजन कराते हैं। उनका एक ही सिद्धांत है—“कोई भूखा न सोए।” यही भावना आज पूरे परिवार और समूह के कार्यों में दिखाई देती है। तराईमाल में निशुल्क अस्पताल, सरायपाली में संचालित स्कूल रायगढ़ में निर्माणाधीन 220 बिस्तरों का अस्पताल और आधुनिक स्कूल इसी सोच की परिणति हैं। ढिमरापुर चौक पर हर गर्मी में चलने वाला प्याऊ हो या किसी जरूरतमंद की मदद, एनआर परिवार हमेशा आगे रहता है। उनका मानना है कि कोई उनके पास बड़ी उम्मीद लेकर आया तो वह उसकी यथासंभव मदद करने की कोशिश करते हैं। जो हमारी कर्मभूमि हमें देती है उसे लौटाना हमारी ही जिम्मेदारी है। संजय कहते हैं कि पिता केवल अभिभावक नहीं, बल्कि पूरे परिवार के मार्गदर्शक हैं। 24 सदस्यों वाला उनका संयुक्त परिवार आज भी चार पीढ़ियों को एक साथ समेटे हुए है। बड़े भाई राजेश अग्रवाल और विजय अग्रवाल के परिवारों सहित सभी सदस्य एक ही छत के नीचे रहते हैं। परिवार का नियम है कि हर दिन कम से कम एक घंटा सभी साथ बैठते हैं, चर्चा करते हैं और इस दौरान कोई भी मोबाइल फोन का उपयोग नहीं करता। संजय मुस्कुराते हुए कहते हैं, “हम 24 लोग नहीं, 24 जिस्म और एक जान हैं। परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखने का श्रेय हमारे पिता को जाता है।” बसना में जन्मे संजय अग्रवाल ने अपने परिवार को उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरते देखा। कभी जमींदारी रही, लेकिन समय के साथ सब कुछ बदल गया। परिवार ने व्यापार का रास्ता चुना और बड़े भाइयों ने वनोपज तथा चावल व्यापार से नई शुरुआत की। वर्ष 1994 में गणित से स्नातक करने के बाद संजय भी इस सफर में शामिल हुए। उन्होंने राइस मिल की स्थापना की और किसानों को उपज का तत्काल भुगतान करने की व्यवस्था शुरू की। यह मॉडल इतना सफल हुआ कि बाद में प्रदेश की कई मिलों ने इसे अपनाया। वर्ष 2003 में वे रायगढ़ आए। यहां के लोगों की सादगी और अपनापन उन्हें भा गया। साझेदारी में रायगढ़ इस्पात की स्थापना के बाद उन्होंने 2007 में स्वतंत्र रूप से एनआर ग्रुप की नींव रखी और आज यह समूह प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक समूहों में गिना जाता है। संजय के अनुसार, उनके पिता हमेशा सिखाते रहे कि कर्मचारी किसी भी उद्योग की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। यही वजह है कि किसी भी प्लांट में दुर्घटना होने पर पूरा परिवार उसे अपना दुख मानता है। वे बताते हैं, “जब कहीं कोई हादसा होता है तो घर में खाना नहीं बनता। ऐसे समय में पिता हमें संभालते हैं और आगे बढ़ने की ताकत देते हैं।” पिता से मिली सीख को याद करते हुए संजय कहते हैं, “उन्होंने हमें मेहनत करना, असफलताओं से घबराना नहीं और समाज को साथ लेकर चलना सिखाया है। उनका कहना है कि जो बीत गया, उसे पीछे छोड़ दो और नई ऊर्जा के साथ फिर से शुरुआत करो। मेहनत का कोई शॉर्टकट नहीं होता। शॉर्टकट बेईमानी की ओर ले जाता है और उसका पतन भी जल्दी होता है।” यही जीवन-मूल्य आज संजय अपने बच्चों अनिकेत और आयुषी को देने का प्रयास कर रहे हैं। उनका मानना है कि मां और पिता दोनों जीवन के दो ऐसे स्तंभ हैं, जिनके बिना परिवार और व्यक्तित्व की कल्पना अधूरी है। बिना मां के जीना संभव नहीं है तो पिता के बिना जिंदगी संभव नहीं है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। संजय अग्रवाल बताते हैं कि 24 सदस्यों वाले उनके संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी ताकत आपसी विश्वास और एक-दूसरे का साथ है। बड़े भाई राजेश अग्रवाल और विजय अग्रवाल ने हर मोड़ पर उनका मार्गदर्शन किया और कर रहे हैं जबकि दोनों बहनें पुष्पा देवी और किरण देवी आज भी परिवार को अपने अनुभव और स्नेह से दिशा देती हैं। पिता के संस्कारों के साथ बड़े भाइयों का सहयोग और पत्नी अंजू अग्रवाल का विश्वास उनकी सफलता की सबसे बड़ी पूंजी रहा है। “जब जीवन में अंजू का साथ मिला तो मेरे कदम और मजबूत हो गए। परिवार के सहयोग ने ही मुझे हर चुनौती का सामना करने का आत्मविश्वास दिया,” वे कहते हैं।
एनटीपीसी लारा ने पाँच वर्षों में 250 बालिकाओं को दी सशक्त भविष्य की उड़ान
4 साल से अभियान का संचालन कर रहा एनटीपीसी, अब तक परियोजना से आसपास के गांवों की लगभग 250 बालिकाएँ लाभान्वित
गुपचुप के ठेले से सपने तक: एक-एक सिक्का जोड़कर अक्षय ने खरीदा अपना ड्रीम फोन
​​विरासत से मिला स्वाद, मेहनत से आया आईफोन
सुनील रामदास : व्यापार विरासत में नहीं मिला, पिता के संस्कार मिले
59 वर्षीय सुनील रामदास अग्रवाल एक सफल उद्योगपति होने के साथ-साथ समाजसेवा का पर्याय माने जाते हैं। लेकिन उनकी कहानी किसी बड़े कारोबारी घराने से शुरू नहीं होती। यह कहानी शुरू होती है खरसिया के एक साधारण परिवार से, जहां उनके पिता रामदास अग्रवाल ने संघर्ष, मेहनत और ईमानदारी की पूंजी से अपने परिवार और व्यवसाय की नींव रखी। खरसिया से शुरू हुआ सफर सारंगढ़ पहुंचा, फिर पत्थलगांव तक गया। चूड़ियों के छोटे से कारोबार के बीच रामदास अग्रवाल अपने तीनों बेटों—सुनील, अनिल और सुशील—को साथ बैठाकर व्यापार की बारीकियां सिखाते थे। उनके लिए कारोबार केवल कमाई का जरिया नहीं था, बल्कि जीवन जीने की एक पाठशाला थी। वर्ष 2002 में सुनील अग्रवाल पत्थलगांव से रायगढ़ आए और ठेकेदारी का काम शुरू किया। मेहनत, दूरदृष्टि और जोखिम उठाने के साहस ने उन्हें जल्द ही छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र के बड़े ठेकेदारों की कतार में ला खड़ा किया। इसके बाद उन्होंने एसकेए ग्रुप की स्थापना कि जिसमें रायगढ़ और रायपुर में स्टील एंड पावर उद्योग और कंस्ट्रक्शन की 4 कंपनी है। लेकिन सफलता के इस शिखर पर पहुंचने के बाद भी वे अपनी जड़ों को नहीं भूले। अपने माता-पिता की शादी की 50वीं वर्षगांठ पर उन्होंने रामदास-द्रौपदी फाउंडेशन की स्थापना की। इस फाउंडेशन के माध्यम से वे वर्षों से समाजसेवा के अनेक कार्य कर रहे हैं। इनमें हर वर्ष लगभग 50 हजार पौधे लगाने का अभियान प्रमुख है। पिछले 11 वर्षों से यह अभियान लगातार जारी है। सुनील अग्रवाल कहते हैं, "हमारे पिता स्वभाव से कड़क थे। वे हमें डांटते भी थे और अनुशासन में रखते थे, ताकि हम व्यापार को अच्छी तरह समझ सकें। लेकिन उनके कठोर व्यक्तित्व के भीतर एक बेहद संवेदनशील और समाजसेवी इंसान छिपा था। उन्हें हमेशा सर्वसमाज की चिंता रहती थी।" वे बताते हैं कि जब भी व्यापार में नुकसान होता, पिता डांटने के बजाय समझाते थे—"घबराना मत, यह नुकसान नहीं, आने वाले समय की सीख है। लेकिन व्यापार कभी मत छोड़ना। ईमानदार रहना, समय का पाबंद रहना और लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना।" रामदास अग्रवाल को इस दुनिया से गए छह वर्ष हो चुके हैं, लेकिन सुनील कहते हैं कि आज भी उन्हें ऐसा लगता है मानो पिता उनके आसपास ही हों। सुबह भगवान की पूजा करने से पहले मैं पिताजी को प्रणाम करता हूं। मेरे लिए वही भगवान हैं। उनकी तस्वीर के सामने खड़े होकर उनसे बात करता हूं, उनसे क्षमा मांगता हूं और अपने हर फैसले की जानकारी देता हूं। मुझे लगता है कि वे आज भी मुझे देख रहे हैं। जहां भी होंगे, हमें देखकर खुश होते होंगे कि उनके दिए संस्कार आज भी हमारे जीवन का मार्गदर्शन कर रहे हैं।" सुनील अग्रवाल कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता की सीख अपनी बेटी सेजल और बेटों अभिषेक व अभिनव को देने का प्रयास किया है। उनके अनुसार तीसरी पीढ़ी भी आज रामदास अग्रवाल के बताए रास्ते पर चल रही है। वे भावुक होकर कहते हैं, "हमें अपने पिता से इतना लगाव है कि हम तीनों भाइयों ने अपने नाम के आगे स्वयं अपने पिता का नाम जोड़ लिया। क्योंकि समाज में जो सम्मान और विश्वास रामदास जी ने कमाया था, वही आज हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। जहां भी जाते हैं, लोग हमें हमारे नाम से कम और रामदास जी के बेटों के रूप में ज्यादा जानते हैं। यही हमारे जीवन की सबसे बड़ी कमाई है।" अपने बच्चों की परवरिश को लेकर वे कहते हैं कि समय बदल गया है। "हमारे समय में पिता की डांट ही सबसे बड़ी सीख होती थी। आज बच्चों को प्यार और दोस्ताना व्यवहार से समझाना पड़ता है। मैंने भी अपने बच्चों को दोस्त की तरह पाला है। लेकिन बाबूजी की एक सीख आज भी उन्हें देता हूं—दूसरे के दुख को अपना दुख समझो, जरूरतमंद की मदद के लिए हमेशा आगे बढ़ो और कर्म को सबसे ऊपर रखो।" उनका मानना है कि धन कमाने की इच्छा हर व्यक्ति में होती है, लेकिन अंत में पहचान धन से नहीं, कर्म और संस्कारों से बनती है। यही विरासत उन्हें अपने पिता से मिली और यही विरासत वे आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं।
ऐतिहासिक होगा इस्कॉन रायगढ़ का जन्माष्टमी महामहोत्सव
एनआईटी रायपुर और खैरागढ़ से भजन करने आयेगा युवाओं का ग्रुप , स्वस्तिवाचन, हरिनाम जप और भगवान का पुष्प अभिषेक रहेगा विशेष आयोजन
11 साल में 10 गुना बढ़ गई श्रीराम शोभायात्रा की भव्यता
पहली बार श्री रामजन्म के अवसर पर पूरे नगर को सजाया जा रहा, 70 झांकियों और दर्जनों दल होंगे शोभायात्रा में शामिल
कैद हो जाएं घरों में रायगढ़ की सड़कें अब चलने लायक नहीं रही !
निगम और जिला प्रशासन अतिक्रमण हटाने तो यातायात विभाग जिम्मेदारी में हुआ फेल, औद्योगिक नगरी में अधिकारियों का फोकस जनसुविधा नहीं धनसुविधा पर
शुरू से ठगा जाता रहा है रायगढ़-आखिर कब तक?
छत्तीसगढ़ एक नये राज्य के तौर पर बनने से पहले रायगढ़ संभावनाओं के बड़े केन्द्रों में से एक था, लेकिन जब छत्तीसगढ़ बना तो रायगढ़ को एक तरह से ठेंगा दिखा दिया गया। नये बने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ने हथिया ली और खुद को न्यायधानी बताते हुए बिलासपुर में हाईकोर्ट और रेवेन्यू बोर्ड जैसे न्यायिक संस्थाओं को अपने हिस्से में शामिल कर लिया। अलावे इसके और भी ढेर सारे राज्य स्तरीय संस्थान रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जैसे जिलों ने झटक लिये। <b>रायगढ़ से छल</b> दरअसल रायगढ़ शुरू से ही ठगा जाता रहा है। वास्तव में छत्तीसगढ़ बनने से पहले मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ की जो स्थिति थी छत्तीसगढ़ बनने के बाद छत्तीसगढ़ में वहीं हाल रायगढ़ का है। बीते 25 वर्षों में रायगढ़ को ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिस पर रायगढ़ के लोग गर्व कर सके। इसी बीच छत्तीसगढ़ के मौजूदा मुख्यमंत्री माननीय विष्णुदेव जी साय जब भारत सरकार के मंत्री थे तब उनके प्रयासों से ही रायगढ़ की झोली में रेल्वे टर्मिनल का सौगात डाला गया था जिसके लिये उनकी उपस्थिति में ही पूरे विधि-विधान के साथ भूमि पूजन भी हुआ था लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी वह टर्मिनल रायगढ़ की झोली से धरातल पर अभी तक नहीं दिखलाई पड़ा है। कह सकते है कि रायगढ़ की झोली के किसी छेद से टर्मिनल का वह सौगात बाहर निकल गया होगा। <b>गौरवशाली अतीत</b> रायगढ़ का एक गौरवशाली अतीत रहा है जहां रियासती दौर में ही 14 देशी राज्यों (रियासतों) का एक अपना हाईकोर्ट हुआ करता था जिसमें भारत के ख्यातिलब्ध न्यायाधीश हिदायत उल्लाह अपनी सेवाएं दे चुके थे, यहीं नहीं रायगढ़ में तात्कालीन १४ पूर्वी रियासतों की राजधानी भी थी और अब वहीं रायगढ़ इन मायनों में आजादी के पहले जहां खड़ा था वहीं खड़ा है। इस बीच अभी हाल के दिनों में यह बात भी सामने आई थी कि रायगढ़ को आने वाले दिनों में राजस्व संभाग का दर्जा दिया जायेगा। अलावे इसके पुलिस का रेंज कार्यालय भी रायगढ़ में ही होगा। ये दोनों बातें अचानक कहां गुम हो गई पता ही नहीं चला जबकि इसी बीच सरगुजा याने अंबिकापुर को संभाग का दर्जा दिया जा चुका है। अलावे इसके कुछ और भी है जिसमें रायगढ़ के जिला जेल को सेन्ट्रल जेल का दर्जा दिये जाने की बात सामने आई थी जिसकी अनुशंसा छ.ग. हाईकोर्ट की एक कमेटी ने की थी पर अभी तक न तो रायगढ़ को संभाग का दर्जा दिया गया न पुलिस का रेंज कार्यालय यहां आया और न ही रायगढ़ जेल को सेन्ट्रल जेल का दर्जा दिया गया। रायगढ़ के साथ किये गये इस सौतेले सलूक के पीछे कुछ भी कारण हो सकते हैं लेकिन इतना तय है कि रायगढ़ को जो मिलना था वह नहीं मिला। ऐसे कई मिसाल है जैसे रायगढ़ में हवाई अड्डे की बात थी वह भी विवादों में उलझकर अकाल मौत का शिकार हो चुका है जबकि इसी बीच बिलासपुर और अंबिकापुर को हवाई अड्डे की सौगात दी जा चुकी है। कुछ यही हाल यहां के केलो बांध का भी है जिसके लोकार्पण के दशक बीत चुके हैं लेकिन बांध से आज तक किसानों के खेतों में पानी का एक बूंद नहीं पहुंचा है। अलबत्ता इसी बीच ९० के दशक में टिड्डी दल की तरह यहां आये उद्योगोंपतियों ने अपने उद्योगों के लिये केलो डेम से पानी लेने की व्यवस्था बेरहमी से कर ली। दरअसल ९० के दशक में जिले के एक बड़े भू-भाग में कोयले के अकूत खजाने का पता चल गया था जिसके चलते देश के कोने-कोने से उद्योगपति यहां पहुंच गये, उन्होंने हजारों एकड़ खेती की जमीन हथिया ली। बड़े पैमाने पर जंगलों को रौंद डाला नतीजा यह हुआ कि रायगढ़ जिला अराजक औद्योगिककरण की चपेट में आ गया परिणाम स्वरूप जिले में औद्योगिक परिवहन से जुड़े भारी भरकम वाहनों की भीड़ लग गई जो जिले के खस्ताहाल सडक़ों पर दौड़ते हुए हादसों को अंजाम देने लगे। वहीं दूसरी ओर बेलगाम उद्योगपतियों ने जिले के पर्यावरण को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। आज रायगढ़ छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। आलम यह है कि समूचे छत्तीसगढ़ में फेफड़ों के लिये दवा की जितनी खपत होती है उन सब में सबसे ज्यादा रायगढ़ में होती है। यहां मृत्यु दर में खासा इजाफा हो चुका है। यह भी उल्लेखनीय है कि जिले में हुए औद्योगिकरण के मद्देनजर रायगढ़ में किरोड़ीमल इंस्ट्रीयूट ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना उद्योगों की तकनीकी आवश्यकता पूरी करने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन यह संस्था बमुश्किल दस साल के बाद भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। अब स्थिति यह है कि संस्था बंद हो चुकी है इसके कर्मचारी वेतन नहीं मिलने के कारण भूखमरी के कगार में पहुंच चुके हैं और संस्था मौत की हिचकियों के साथ जिंदा है। स्थानीय जन तथा इस संस्था के कर्मचारी संस्था को राज्य शासन द्वारा सरकार के अधीन लिये जाने की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन अलग-अलग पार्टियों के सरकार ने इस मांग की पूरी तरह अनदेखी कर दी और इसके विपरीत दुर्ग में कर्ज से डूबे चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज को शासनाधीन कर लिया गया। qqq <b>अब ऊंची छलांग के लिये तैयार है रायगढ़</b> इन परिस्थितियों के लिये अगर किसी को जवाबदेह ठहराया जा सकता है तो वह सिर्फ रायगढ़ की जनता और उसके राजनैतिक नेतृत्व ही है। बहरहाल अब इन बातों को लेकर गिला-शिकवा का कोई अर्थ नहीं है, अब तो बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि ले के अनुसार आगे ही जाना होगा। इन मायनों में दो राय नहीं की विधानसभा के पिछले चुनाव में रायगढ़ से पूर्व आईएएस अधिकारी ओपी चौधरी का चुना जाना रायगढ़ के लिये भाग्योदय जैसा ही है। अपने एक साल के कार्यकाल में ही ओपी चौधरी ने रायगढ़ में विकास के लिये जो खाका खिंचा है उसी में विकास को लेकर उनकी सुलझी हुई समझ और अवधारणा की झलक मिल जाती है। उन्होंने इन एक वर्ष में विकास के हर क्षेत्र में योजनाओं की मंजूरी देकर यह जता दिया है कि उनके पास रायगढ़ के विकास की ठोस रूप-रेखा है। जिसके तहत रायगढ़ में चौतरफा फोरलेन सडक़ों का जाल बिछाया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बेहतर पहलकदमी हुई है। खासतौर पर शिक्षा के क्षेत्र में नालंदा परिसर जैसे ज्ञान के संस्थान की स्थापना इन मायनों में बेहद पिछड़े रायगढ़ के लिये एक क्रांतिकारी शुरूआत है। इस संस्थान के शुरू हो जाने से रायगढ़ के युवाओं को जरूरी पुस्तकों के लिये भटकना नहीं पड़ेगा और वे इस संस्थान का लाभ लेते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी जगह बनाने में निश्चित तौर पर कामयाब होंगे और यहीं वास्तविक विकास है। ओपी चौधरी का विजन अभी अपने समग्र रूप में नहीं दिखलाई पड़ा है लेकिन आने वाले दो-तीन वर्षों में रायगढ़ को एक नई पहचान के साथ देखा जा सकेगा। कह सकते हैं कि तब रायगढ़ विकास के मायनों में एक ऊंची छलांग लगाने के लिये तैयार हो चुका होगा।
अग्निवीर, अग्निपथ और सियासत....
योजना से सेना कमजोर होगी या नहीं यह वक्त बताएगा लेकिन इस योजना के बंद होने से देश जरुर कमजोर होगा
रायगढ़ स्वास्थ्य विभाग का दामाद तिलेश दीवान !
आयुष्मान घोटाले से हर बार बचा, बहुमंजिला निजी आवास होने के बाद अब विभाग ने दिया आलीशान आवास का तोहफा
कैद हो जाएं घरों में रायगढ़ की सड़कें अब चलने लायक नहीं रही !
निगम और जिला प्रशासन अतिक्रमण हटाने तो यातायात विभाग जिम्मेदारी में हुआ फेल, औद्योगिक नगरी में अधिकारियों का फोकस जनसुविधा नहीं धनसुविधा पर
शुरू से ठगा जाता रहा है रायगढ़-आखिर कब तक?
छत्तीसगढ़ एक नये राज्य के तौर पर बनने से पहले रायगढ़ संभावनाओं के बड़े केन्द्रों में से एक था, लेकिन जब छत्तीसगढ़ बना तो रायगढ़ को एक तरह से ठेंगा दिखा दिया गया। नये बने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर ने हथिया ली और खुद को न्यायधानी बताते हुए बिलासपुर में हाईकोर्ट और रेवेन्यू बोर्ड जैसे न्यायिक संस्थाओं को अपने हिस्से में शामिल कर लिया। अलावे इसके और भी ढेर सारे राज्य स्तरीय संस्थान रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जैसे जिलों ने झटक लिये। <b>रायगढ़ से छल</b> दरअसल रायगढ़ शुरू से ही ठगा जाता रहा है। वास्तव में छत्तीसगढ़ बनने से पहले मध्यप्रदेश में छत्तीसगढ़ की जो स्थिति थी छत्तीसगढ़ बनने के बाद छत्तीसगढ़ में वहीं हाल रायगढ़ का है। बीते 25 वर्षों में रायगढ़ को ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिस पर रायगढ़ के लोग गर्व कर सके। इसी बीच छत्तीसगढ़ के मौजूदा मुख्यमंत्री माननीय विष्णुदेव जी साय जब भारत सरकार के मंत्री थे तब उनके प्रयासों से ही रायगढ़ की झोली में रेल्वे टर्मिनल का सौगात डाला गया था जिसके लिये उनकी उपस्थिति में ही पूरे विधि-विधान के साथ भूमि पूजन भी हुआ था लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी वह टर्मिनल रायगढ़ की झोली से धरातल पर अभी तक नहीं दिखलाई पड़ा है। कह सकते है कि रायगढ़ की झोली के किसी छेद से टर्मिनल का वह सौगात बाहर निकल गया होगा। <b>गौरवशाली अतीत</b> रायगढ़ का एक गौरवशाली अतीत रहा है जहां रियासती दौर में ही 14 देशी राज्यों (रियासतों) का एक अपना हाईकोर्ट हुआ करता था जिसमें भारत के ख्यातिलब्ध न्यायाधीश हिदायत उल्लाह अपनी सेवाएं दे चुके थे, यहीं नहीं रायगढ़ में तात्कालीन १४ पूर्वी रियासतों की राजधानी भी थी और अब वहीं रायगढ़ इन मायनों में आजादी के पहले जहां खड़ा था वहीं खड़ा है। इस बीच अभी हाल के दिनों में यह बात भी सामने आई थी कि रायगढ़ को आने वाले दिनों में राजस्व संभाग का दर्जा दिया जायेगा। अलावे इसके पुलिस का रेंज कार्यालय भी रायगढ़ में ही होगा। ये दोनों बातें अचानक कहां गुम हो गई पता ही नहीं चला जबकि इसी बीच सरगुजा याने अंबिकापुर को संभाग का दर्जा दिया जा चुका है। अलावे इसके कुछ और भी है जिसमें रायगढ़ के जिला जेल को सेन्ट्रल जेल का दर्जा दिये जाने की बात सामने आई थी जिसकी अनुशंसा छ.ग. हाईकोर्ट की एक कमेटी ने की थी पर अभी तक न तो रायगढ़ को संभाग का दर्जा दिया गया न पुलिस का रेंज कार्यालय यहां आया और न ही रायगढ़ जेल को सेन्ट्रल जेल का दर्जा दिया गया। रायगढ़ के साथ किये गये इस सौतेले सलूक के पीछे कुछ भी कारण हो सकते हैं लेकिन इतना तय है कि रायगढ़ को जो मिलना था वह नहीं मिला। ऐसे कई मिसाल है जैसे रायगढ़ में हवाई अड्डे की बात थी वह भी विवादों में उलझकर अकाल मौत का शिकार हो चुका है जबकि इसी बीच बिलासपुर और अंबिकापुर को हवाई अड्डे की सौगात दी जा चुकी है। कुछ यही हाल यहां के केलो बांध का भी है जिसके लोकार्पण के दशक बीत चुके हैं लेकिन बांध से आज तक किसानों के खेतों में पानी का एक बूंद नहीं पहुंचा है। अलबत्ता इसी बीच ९० के दशक में टिड्डी दल की तरह यहां आये उद्योगोंपतियों ने अपने उद्योगों के लिये केलो डेम से पानी लेने की व्यवस्था बेरहमी से कर ली। दरअसल ९० के दशक में जिले के एक बड़े भू-भाग में कोयले के अकूत खजाने का पता चल गया था जिसके चलते देश के कोने-कोने से उद्योगपति यहां पहुंच गये, उन्होंने हजारों एकड़ खेती की जमीन हथिया ली। बड़े पैमाने पर जंगलों को रौंद डाला नतीजा यह हुआ कि रायगढ़ जिला अराजक औद्योगिककरण की चपेट में आ गया परिणाम स्वरूप जिले में औद्योगिक परिवहन से जुड़े भारी भरकम वाहनों की भीड़ लग गई जो जिले के खस्ताहाल सडक़ों पर दौड़ते हुए हादसों को अंजाम देने लगे। वहीं दूसरी ओर बेलगाम उद्योगपतियों ने जिले के पर्यावरण को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। आज रायगढ़ छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। आलम यह है कि समूचे छत्तीसगढ़ में फेफड़ों के लिये दवा की जितनी खपत होती है उन सब में सबसे ज्यादा रायगढ़ में होती है। यहां मृत्यु दर में खासा इजाफा हो चुका है। यह भी उल्लेखनीय है कि जिले में हुए औद्योगिकरण के मद्देनजर रायगढ़ में किरोड़ीमल इंस्ट्रीयूट ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना उद्योगों की तकनीकी आवश्यकता पूरी करने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन यह संस्था बमुश्किल दस साल के बाद भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। अब स्थिति यह है कि संस्था बंद हो चुकी है इसके कर्मचारी वेतन नहीं मिलने के कारण भूखमरी के कगार में पहुंच चुके हैं और संस्था मौत की हिचकियों के साथ जिंदा है। स्थानीय जन तथा इस संस्था के कर्मचारी संस्था को राज्य शासन द्वारा सरकार के अधीन लिये जाने की मांग करते आ रहे हैं, लेकिन अलग-अलग पार्टियों के सरकार ने इस मांग की पूरी तरह अनदेखी कर दी और इसके विपरीत दुर्ग में कर्ज से डूबे चंदूलाल चंद्राकर मेडिकल कॉलेज को शासनाधीन कर लिया गया। qqq <b>अब ऊंची छलांग के लिये तैयार है रायगढ़</b> इन परिस्थितियों के लिये अगर किसी को जवाबदेह ठहराया जा सकता है तो वह सिर्फ रायगढ़ की जनता और उसके राजनैतिक नेतृत्व ही है। बहरहाल अब इन बातों को लेकर गिला-शिकवा का कोई अर्थ नहीं है, अब तो बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि ले के अनुसार आगे ही जाना होगा। इन मायनों में दो राय नहीं की विधानसभा के पिछले चुनाव में रायगढ़ से पूर्व आईएएस अधिकारी ओपी चौधरी का चुना जाना रायगढ़ के लिये भाग्योदय जैसा ही है। अपने एक साल के कार्यकाल में ही ओपी चौधरी ने रायगढ़ में विकास के लिये जो खाका खिंचा है उसी में विकास को लेकर उनकी सुलझी हुई समझ और अवधारणा की झलक मिल जाती है। उन्होंने इन एक वर्ष में विकास के हर क्षेत्र में योजनाओं की मंजूरी देकर यह जता दिया है कि उनके पास रायगढ़ के विकास की ठोस रूप-रेखा है। जिसके तहत रायगढ़ में चौतरफा फोरलेन सडक़ों का जाल बिछाया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बेहतर पहलकदमी हुई है। खासतौर पर शिक्षा के क्षेत्र में नालंदा परिसर जैसे ज्ञान के संस्थान की स्थापना इन मायनों में बेहद पिछड़े रायगढ़ के लिये एक क्रांतिकारी शुरूआत है। इस संस्थान के शुरू हो जाने से रायगढ़ के युवाओं को जरूरी पुस्तकों के लिये भटकना नहीं पड़ेगा और वे इस संस्थान का लाभ लेते हुए प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी जगह बनाने में निश्चित तौर पर कामयाब होंगे और यहीं वास्तविक विकास है। ओपी चौधरी का विजन अभी अपने समग्र रूप में नहीं दिखलाई पड़ा है लेकिन आने वाले दो-तीन वर्षों में रायगढ़ को एक नई पहचान के साथ देखा जा सकेगा। कह सकते हैं कि तब रायगढ़ विकास के मायनों में एक ऊंची छलांग लगाने के लिये तैयार हो चुका होगा।
अग्निवीर, अग्निपथ और सियासत....
योजना से सेना कमजोर होगी या नहीं यह वक्त बताएगा लेकिन इस योजना के बंद होने से देश जरुर कमजोर होगा
रायगढ़ स्वास्थ्य विभाग का दामाद तिलेश दीवान !
आयुष्मान घोटाले से हर बार बचा, बहुमंजिला निजी आवास होने के बाद अब विभाग ने दिया आलीशान आवास का तोहफा
कलेक्टर भीम सिंह ने भारी बारिश के बीच संभाला मोर्चा, देखें तस्वीरें
निगम अमला बीती रात से आयुक्त के साथ पूरे शहर में डटा हुआ है
तस्वीरों में देखें रायगढ़ में जनता कर्फ्यू का असर
22 मार्च यानी रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर जिले में भी जनता कर्फ्यू का असर देखने को मिला। दोपहर तक पूरा शहर स्वस्फूर्त बंद था। हर मुख्य मार्ग और बाजार बंद मिले। गली-कूचे तक कोई व्यक्ति बाहर नहीं निकला।
हरि बोल, जय जगन्नाथ के उद्घोष के साथ निकली रथयात्रा, देखें गैलरी
रायगढ़ में दो दिनों की रथयात्रा आयोजित होती रही है। इसी क्रम में आज रथ द्वितिया के दिन शहर के प्राचीन जगन्नाथ मंदिर से भगवान श्री को विधिविधान पूर्वक पूजा अर्चना पश्चात मंदिर के गर्भगृह तथा मंदिर परिसर से जय जगन्नाथ के जयघोष और घंट शंख ध्वनि के बीच ससम्मान बाहर निकाला गया। राजापारा स्थित प्रांगढ़ में मेले सा माहौल था और हजारो की संख्या में श्रद्धालु भक्तगण भगवान श्री के दर्शन करने के लिए पहुंचे हुए थे। इससे पहले कल भगवान जगन्नाथ की विधि विधान से पूजा की गई जिसे फोटोग्राफर वेदव्यास गुप्ता ने अपने कैमरे में कैद किया।
इप्टा रायगढ़ के 25वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की झलकियां
27 से 31 जनवरी तक पॉलिटेक्निक ऑडिटोरिम में इप्टा रायगढ़ द्वारा 25वां राष्ट्रीय नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया गया। जिसमें चार नाटक एवं दो फीचर फिल्में दिखाई गईं। समारोह की शुरुआत रायपुर के मशहूर रंगकर्मी मिर्जा मसूद को 10वां शरदचंद्र वैरागकर अवार्ड देकर की गई। यह कूवत सिर्फ रंगमंच रखता है जो वर्तमान सत्ता के मठाधीशों पर अजब मदारी गजब तमाशा नाटक के माध्यम से सीधे कटाक्ष कर सकता है। जहां एक मदारी को राजा बना दिया जाता है, शब्दों के अस्तित्व को खत्म कर दिया जाता है। बंदर राष्ट्रीय पशु बन जाता है। गांधी चौक नाटक में गांधीजी की प्रतिमा स्वयं यह चलकर वहां से हट जाती है कि जब रक्षक की भक्षक बन गए तो कोई क्या कर सकता है। नोटबंदी और जीएसटी पर गांव वाले सीधे प्रहार करते हैं। सुबह होने वाली है की लेखी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिबंध होने के बाद लोगों को जागरूक करने को किताब लिखती और किताब को ही फांसी हो जाती है। बोल की लब आजाद हैं तेरे लोगों को दर्शकदीर्घा में झकघोर के रख देती है। तुरूप और भूलन जैसी फिल्में लोगों के मनोरंजन के अलावा दमदार संदेश भी देती है। तो देखें इस शानदार नाट्य समारोह एवं फिल्म फेस्टिवल की कुछ झलकियां
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